जिंदगी की दौड़ यूँ ही रोजमर्रे की,
मन में मची घमासान हलचल.
बाहर 'सब चलता है' की नीरव शांति,
अंदर 'आख़िर क्यूँ' का कोलाहल.
भौतिकता की इस लंगड़ी दौड़ में,
कैसे हो समाज की मुश्किलें हल.
हर कोई आज बस यही सोच में,
वो खुद नहीं, कोई और करे पहल.
जब तक खुद पे ना बन पड़े,
विरोध का सुर कहाँ निकलता है.
वरना सब के दिल में बस यही स्वर,
कि भई आजकल सब चलता है.
चिंतन यही मन में, कैसे बनेगी,
बिगडती हुई ये बात ये हालात.
आखिर कौन उठाएगा अपना हाथ,
कहाँ से होगी बदलाव की शुरुआत.
मन के अन्दर जब कुछ ऐसे विचार भाव आते हैं जो कि कलम को उद्वेलित करते हैं कि उनको कविता, छंद, मुक्तक या यूँ ही एक माला में पिरो दूँ !! कुछ ऐसे ही विचारों का संग्रह किया है यहाँ पर !
Wednesday, November 3, 2010
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