Friday, September 25, 2026

पर तिश्नगी बढ़ती रही

जो पास था, उसकी क़दर तो रोज़ ही कमती रही

जो नहीं मिला, उसी की चाहत में उम्र ढलती रही। 


जिसे पाने की दुआ में जाने कितनी रातें काट दीं,

वो मिला तो दिल में कोई और आरज़ू पलती रही।


ज़िंदगी ने एक ही सबक़ दिया हर मोड़ पर, 

कीमत जितनी कम थी, चाह उतनी घटती रही।


रेत पर लिखते रहे जो ख़्वाहिशों के नाम यूँ,

मौज आई, एक मिटती रही, दूसरी बनती रही।


जिसके होने से मुकम्मल ज़िंदगी लगती थी कभी,

वो मिला तो ज़िंदगी फिर भी अधूरी लगती रही।


दूर का हर ख़्वाब जैसे चाँद से बेहतर लगा,

पास आया तो उसी की रौशनी ना जंचती रही।


हमने खोया जो कभी, उसका मलाल आज भी है,

जो मिला था, उसकी नेमत याद कब रहती रही।


आदमी की फ़ितरतों का भी अजब दस्तूर है,

प्यास तो बुझ गयी पर तिश्नगी बढ़ती रही। 

Saturday, August 15, 2026

नमन माटी के उन सपूतों को

जिनके लहू की हर बूँद से,

भारत स्वर्णिम परिवेश हुआ,

नमन माटी के उन सपूतों को,

जिनसे रोशन देश हुआ।

१

जिनने हँसकर प्राण दिए थे,

माँ की लाज बचाने को,

जिनने अपना आज लुटाया,

भारत का कल पाने को।

खुद के घर के दीप बुझे

जिनके पग लाखों शूल मिले,

आँगन जिनके सूने थे पर,

भारत के आँगन फूल खिले।

जिनके वीर पराक्रम से,

अपना हर दुश्मन शेष हुआ

नमन माटी के उन सपूतों को,

जिनसे रोशन देश हुआ!

२

सीने पे शत-शत घाव सहे,

पर शीश कभी न झुकने दिया,

मृत्यु खड़ी थी सम्मुख पर,

पग को पीछे न मुड़ने दिया।

रण में जब गूँजी हुंकारें,

काँप उठा शत्रु का मन,

रक्त-शोणित की ज्वाला से,

तिल-तिल जला हर दुश्मन।

जिनके रण-रक्तिम त्यागों से,

स्वाधीन प्रभात का वेश हुआ

नमन माटी के उन सपूतों को,

जिनसे रोशन देश हुआ!

३

माँ ने आँसू पीकर अपने,

रण को अपना अंश दिया,

सुहागिन ने वीर-विरह का,

जीवन भर का दंश लिया

मातृभूमि की रक्षा में

बहनों ने अपनी राखी दे दी,

कितने बापों ने देश की खातिर

हंसकर अपनी लाठी दे दी

ऐसे अनगिन बलिदानों से

हर संकट अवशेष हुआ।

नमन माटी के उन सपूतों को,

जिनसे रोशन देश हुआ!

४

हिमगिरि के उच्च शिखर पर,

जो प्रहरी बन खड़े हुए,

बर्फीली आँधी में भी जो,

भारत के हित अड़े हुए।

जो जाग रहे हैं सीमा पर,

हर उत्सव-त्योहारों में,

जिनके दम पर चैन से सोते,

हम अपने घर-बारों में।

जिनकी जागी आँखों से ही,

भारत निर्भय स्वदेश हुआ

नमन माटी के उन सपूतों को,

जिनसे रोशन देश हुआ!

५

कर्ज नहीं हम उन वीरों का,

बस फूल चढ़ाकर टालेंगे,

जिन सपनों पर प्राण दिए वो,

प्राण लगाकर पालेंगे।

उठो, समय फिर माँग रहा है

त्याग, तपस्या और बलिदान,

जाति-पंथ की क्षुद्र सीमाएँ,

तोड़ उठे अब हिंदुस्तान।

जिस दिन हम सब एक हुए तो,

भारत फिर विश्व-विशेष हुआ

नमन माटी के उन सपूतों को,

जिनसे रोशन देश हुआ!

Thursday, January 15, 2026

कुछ नहीं

बे-तलब तुम कहते कुछ नही

बा-अदब हम कहते 'कुछ नहीं'! 


आंखों में किताब है पूरी

लब क्यूं कहते कुछ नहीं?


बातों का मौसम भी हो

तब क्यूं कहते कुछ नहीं?


हमने कुछ ना चाहा कभी

कब तुम कहते, 'कुछ नहीं'!


कहते रहते सब कुछ हैं

हम यूं कहते 'कुछ नहीं'!


सुनने को हैं व्याकुल कान

अब क्यूं कहते कुछ नहीं?


सदा नपे-तुले, सधे शब्द ही

बेढब क्यूं कहते कुछ नहीं! 


सोचा हर-सू तेरे शब्द क्यूंकि

बे-सबब तुम कहते कुछ नहीं! 


बोले भी तो शब्द अनबुझे

मतलब तुम कहते कुछ नहीं!


हम कैसे सब समझ लें

जब तुम कहते कुछ नहीं !

पर तिश्नगी बढ़ती रही

जो पास था, उसकी क़दर तो रोज़ ही कमती रही जो नहीं मिला, उसी की चाहत में उम्र ढलती रही।  जिसे पाने की दुआ में जाने कितनी रातें काट दीं, वो मिल...