जो पास था, उसकी क़दर रोज़ कम होती रही
जो नहीं मिला, उसी की चाहत में उम्र ढलती रही।
जिसे पाने की दुआ में जाने कितनी रातें काट दीं,
वो मिला तो दिल में कोई और आरज़ू पलती रही।
ज़िंदगी ने एक ही सबक़ दिया हर मोड़ पर,
कीमत जितनी कम हुई, चाह उतनी घटती रही।
रेत पर लिखते रहे जो ख़्वाहिशों के नाम यूँ,
मौज आई, एक मिटती रही, दूसरी बनती रही।
जिसके होने से मुकम्मल ज़िंदगी लगती थी कभी,
वो मिला तो ज़िंदगी फिर भी अधूरी लगती रही।
दूर का हर ख़्वाब जैसे चाँद से बेहतर लगा,
पास आया तो उसी की रौशनी कम लगती रही।
हमने खोया जो कभी, उसका मलाल आज भी है,
जो मिला था, उसकी नेमत याद कब रहती रही।
आदमी की फ़ितरतों का भी अजब दस्तूर है,
प्यास तो बुझ गयी पर तिश्नगी बढ़ती रही।