चाय अब भी शायद
आग पर वैसे ही उबलता होगा
जैसे यादें पके आते थे,
वो मेज़ अब भी वहीं होगी,
जहाँ चाय के साथ
कुछ ख़्वाब रखे जाते थे।
कभी कॉफ़ी के प्याले के पास
एक खुली-सी किताब,
या कोरे पन्ने पर कुछ सूखे हुये भाव,
जिनमें होंगी कुछ अनकही बातें
या फिर कुछ ताज़े अनछुए घाव!
कभी उस तरफ़ देखता हुये
जहाँ से कोई आता नहीं अब,
मगर शाम को फिर भी पलकें
अपना रूख नहीं मोड़तीं,
अजीब है न,
कुछ मुलाक़ातें ख़त्म होकर भी
अपनी जगह नहीं छोड़तीं।
चाय बनती है,
दो प्याले भी रखे जाते हैं
कभी-कभी,
और फिर एक को मेज़ पर ही
छोड़ दिया जाता है
शायद वो आ जाए
भूल कर नहीं याद कर के
अभी-अभी!
हां, कभी-कभी ही सही
कुछ कविता गढ़े जाते हैं
और महफ़िल में अब भी
शेर तो पढ़े जाते हैं.
दाद भी मिलते हैं,
बस वो पल नहीं होता अब,
जिसकी ख़ामोशी में भी
मिला करता था
हर मिसरे का मतलब!
उस मोड़ पर
जहाँ से लौटना भी मुमकिन है
और आगे बढ़ जाना भी
एक दिल खड़ा है आज,
कि इस सन्नाटे में भी
शायद कोई सदा आएगी।
पर ये भी मालूम है
ज़रूरी नहीं कि आएगी आवाज़!
नज़रें जमीं हैं
उसी मोड़ पर
बिना किसी भी
उम्मीद की डोर पर,
पर कुछ इंतज़ार
बस राह तकने के लिये होता है
कुछ ख्वाब
रात भर जगने के लिये होता है
कुछ ग़मे उल्फ़त
यूं ही सहने के लिये होता है
और बेशकीमती अल्फ़ाज़
बस आंखों से कहने के लिये होता है!