मुलाज़मत की खातिर ही बस
रखे हमने बाहर को कदम
भूलें नहीं है आज भी अपनी जड़ें
माटी से बहुत प्यार करते हैं हम ।
वो माटी जिसकी है अमिट कहानी,
हर कण में संस्कृति, हर कण में स्वाभिमानी।
जहाँ वैशाली ने जग को संदेश सुनाया,
प्रथम गणतंत्र का दीप विश्व में जलाया।
यहीं अशोक बने करुणा के महान अवतार,
थाम शांति का धम्म, छोड़ दिया तलवार
स्तंभों पर अंकित शांति का अमर विधान,
जिस धरती ने पाया विश्व में सम्मान।
यहीं आर्यभट ने गगन को मापा था ज्ञान से,
अंकों को दी नई भाषा, गणित को पहचान से।
शून्य की शक्ति, तारों का गूढ़ हिसाब,
इस माटी ने विज्ञान को दिया अद्भुत ख्वाब।
नालंदा की ईंटों में विद्या की गूँज आज भी है
तक्षशिला की छाया में प्रश्नों की बूझ आज भी है
चाणक्य की नीति, चंद्रगुप्त का स्वाभिमान,
इसी माटी ने गढ़ा भारत का स्वर्णिम पहचान।
यहाँ मगध का सिंहासन था,
जहाँ से राज करना सीखा गया,
चंद्रगुप्त की दूरदृष्टि ने
पूरी दुनिया को रास्ता दिया।
चाणक्य यहाँ पैदा हुए थे,
जिन्होंने चालाकी नहीं, नीति लिखी,
तख़्त नहीं, व्यवस्था गढ़ी
और राजनीति ने इज़्ज़त सिखी।
यहीं बुद्ध को बोध मिला,
यहीं महावीर ने राह दिखाई,
तलवार नहीं, विचार उठे
और दुनिया झुकती चली आई।
गुरु गोविंद सिंह की जन्मभूमि पावन यह धरा,
जहाँ से उठी ज्वाला, अन्याय से जा भिड़ा।
खालसा की हुंकार, धर्म और बलिदान,
जहाँ की माटी में बसता है शौर्य महान।
राजेन्द्र प्रसाद की सरलता, सेवा और त्याग,
जन-जन के राष्ट्रपति, सादगी का अनुराग।
लोकतंत्र की नींव को जिसने सदा संवारा,
उस यश को इस धरती ने गर्व से निहारा।
दिनकर की ओजस्वी वाणी, क्रांति का उद्गार,
कलम बनी तलवार, शब्द बने हुंकार।
“सिंहासन खाली करो” की जो गूँजी पुकार,
वह बिहार की माटी का ही तो था उपहार।
वो माटी जहाँ गंगा बहती है,
जहाँ पसीना पूजा जाता है,
जहाँ सपनों को नाम नहीं
संघर्ष से पहचाना जाता है।
फिर भी क्यूँ तौला जाता है
लहजे, बोली और शक्ल से,
एक मज़ाक, एक ठप्पा
बाँध सबको एक नक़ल से।
पता है कि प्रशंसा की तरह
आप हमसे अक्सर कहते हो,
पर मेरे लिये तो गाली ही है कि
यार तुम बिहारी नहीं लगते हो।
उस माटी से आकर दूर यहाँ
देश का भविष्य गढ़ते हैं हम,
हाँ, बिहारी लगते नहीं हैं हम,
बिहार को दिल में रखते हैं हम ।