Thursday, October 22, 2026

मोड़

चाय अब भी शायद

आग पर वैसे ही उबलता होगा

जैसे यादें पके आते थे, 

वो मेज़ अब भी वहीं होगी,

जहाँ चाय के साथ

कुछ ख़्वाब रखे जाते थे।


कभी कॉफ़ी के प्याले के पास

एक खुली-सी किताब,

या कोरे पन्ने पर कुछ सूखे हुये भाव, 

जिनमें होंगी कुछ अनकही बातें

या फिर कुछ ताज़े अनछुए घाव! 


कभी उस तरफ़ देखता हुये

जहाँ से कोई आता नहीं अब,

मगर शाम को फिर भी पलकें

अपना रूख नहीं मोड़तीं,

अजीब है न,

कुछ मुलाक़ातें ख़त्म होकर भी

अपनी जगह नहीं छोड़तीं।


चाय बनती है,

दो प्याले भी रखे जाते हैं

कभी-कभी,

और फिर एक को मेज़ पर ही

छोड़ दिया जाता है

शायद वो आ जाए

भूल कर नहीं याद कर के

अभी-अभी! 


हां, कभी-कभी ही सही

कुछ कविता गढ़े जाते हैं

और महफ़िल में अब भी

शेर तो पढ़े जाते हैं.

दाद भी मिलते हैं,

बस वो पल नहीं होता अब,

जिसकी ख़ामोशी में भी

मिला करता था

हर मिसरे का मतलब! 


उस मोड़ पर

जहाँ से लौटना भी मुमकिन है

और आगे बढ़ जाना भी

एक दिल खड़ा है आज,

कि इस सन्नाटे में भी

शायद कोई सदा आएगी।

पर ये भी मालूम है

ज़रूरी नहीं कि आएगी आवाज़!


नज़रें जमीं हैं

उसी मोड़ पर

बिना किसी भी

उम्मीद की डोर पर, 

पर कुछ इंतज़ार

बस राह तकने के लिये होता है

कुछ ख्वाब

रात भर जगने के लिये होता है

कुछ ग़मे उल्फ़त

यूं ही सहने के लिये होता है

और बेशकीमती अल्फ़ाज़

बस आंखों से कहने के लिये होता है! 






Friday, September 25, 2026

पर तिश्नगी बढ़ती रही

जो पास था, उसकी क़दर तो रोज़ ही कमती रही

जो नहीं मिला, उसी की चाहत में उम्र ढलती रही। 


जिसे पाने की दुआ में जाने कितनी रातें काट दीं,

वो मिला तो दिल में कोई और आरज़ू पलती रही।


ज़िंदगी ने एक ही सबक़ दिया हर मोड़ पर, 

कीमत जितनी कम थी, चाह उतनी घटती रही।


रेत पर लिखते रहे जो ख़्वाहिशों के नाम यूँ,

मौज आई, एक मिटती रही, दूसरी बनती रही।


जिसके होने से मुकम्मल ज़िंदगी लगती थी कभी,

वो मिला तो ज़िंदगी फिर भी अधूरी लगती रही।


दूर का हर ख़्वाब जैसे चाँद से बेहतर लगा,

पास आया तो उसी की रौशनी ना जंचती रही।


हमने खोया जो कभी, उसका मलाल आज भी है,

जो मिला था, उसकी नेमत याद कब रहती रही।


आदमी की फ़ितरतों का भी अजब दस्तूर है,

प्यास तो बुझ गयी पर तिश्नगी बढ़ती रही। 

Saturday, August 15, 2026

नमन माटी के उन सपूतों को

जिनके लहू की हर बूँद से,

भारत स्वर्णिम परिवेश हुआ,

नमन माटी के उन सपूतों को,

जिनसे रोशन देश हुआ।

१

जिनने हँसकर प्राण दिए थे,

माँ की लाज बचाने को,

जिनने अपना आज लुटाया,

भारत का कल पाने को।

खुद के घर के दीप बुझे

जिनके पग लाखों शूल मिले,

आँगन जिनके सूने थे पर,

भारत के आँगन फूल खिले।

जिनके वीर पराक्रम से,

अपना हर दुश्मन शेष हुआ

नमन माटी के उन सपूतों को,

जिनसे रोशन देश हुआ!

२

सीने पे शत-शत घाव सहे,

पर शीश कभी न झुकने दिया,

मृत्यु खड़ी थी सम्मुख पर,

पग को पीछे न मुड़ने दिया।

रण में जब गूँजी हुंकारें,

काँप उठा शत्रु का मन,

रक्त-शोणित की ज्वाला से,

तिल-तिल जला हर दुश्मन।

जिनके रण-रक्तिम त्यागों से,

स्वाधीन प्रभात का वेश हुआ

नमन माटी के उन सपूतों को,

जिनसे रोशन देश हुआ!

३

माँ ने आँसू पीकर अपने,

रण को अपना अंश दिया,

सुहागिन ने वीर-विरह का,

जीवन भर का दंश लिया

मातृभूमि की रक्षा में

बहनों ने अपनी राखी दे दी,

कितने बापों ने देश की खातिर

हंसकर अपनी लाठी दे दी

ऐसे अनगिन बलिदानों से

हर संकट अवशेष हुआ।

नमन माटी के उन सपूतों को,

जिनसे रोशन देश हुआ!

४

हिमगिरि के उच्च शिखर पर,

जो प्रहरी बन खड़े हुए,

बर्फीली आँधी में भी जो,

भारत के हित अड़े हुए।

जो जाग रहे हैं सीमा पर,

हर उत्सव-त्योहारों में,

जिनके दम पर चैन से सोते,

हम अपने घर-बारों में।

जिनकी जागी आँखों से ही,

भारत निर्भय स्वदेश हुआ

नमन माटी के उन सपूतों को,

जिनसे रोशन देश हुआ!

५

कर्ज नहीं हम उन वीरों का,

बस फूल चढ़ाकर टालेंगे,

जिन सपनों पर प्राण दिए वो,

प्राण लगाकर पालेंगे।

उठो, समय फिर माँग रहा है

त्याग, तपस्या और बलिदान,

जाति-पंथ की क्षुद्र सीमाएँ,

तोड़ उठे अब हिंदुस्तान।

जिस दिन हम सब एक हुए तो,

भारत फिर विश्व-विशेष हुआ

नमन माटी के उन सपूतों को,

जिनसे रोशन देश हुआ!

Thursday, January 15, 2026

कुछ नहीं

बे-तलब तुम कहते कुछ नही

बा-अदब हम कहते 'कुछ नहीं'! 


आंखों में किताब है पूरी

लब क्यूं कहते कुछ नहीं?


बातों का मौसम भी हो

तब क्यूं कहते कुछ नहीं?


हमने कुछ ना चाहा कभी

कब तुम कहते, 'कुछ नहीं'!


कहते रहते सब कुछ हैं

हम यूं कहते 'कुछ नहीं'!


सुनने को हैं व्याकुल कान

अब क्यूं कहते कुछ नहीं?


सदा नपे-तुले, सधे शब्द ही

बेढब क्यूं कहते कुछ नहीं! 


सोचा हर-सू तेरे शब्द क्यूंकि

बे-सबब तुम कहते कुछ नहीं! 


बोले भी तो शब्द अनबुझे

मतलब तुम कहते कुछ नहीं!


हम कैसे सब समझ लें

जब तुम कहते कुछ नहीं !

Sunday, December 28, 2025

क्या सोचता है ये चाँद

आसमान में भी एक चाँद है,

मेरे सिर पर भी एक चमकता,

वह रात को निकलता है साहब,

मेरा वाला पूरे दिन दमकता।


वह बादलों से आँख-मिचौनी खेले,

मैं टोपी से हालत ढकता,

वह ठंडक बाँटे चाँदनी में,

मेरा पसीने में तपता।


दोनों गोल, दोनों पर दाग़,

दोनों ही चाँदी जैसा उजला,

आसमान वाले पर शेर लिखे जाते,

और मेरे वाले पर चुटकुला।


आईना रोज़ सच्चाई बोले,

ना कंघी, ना तेल की दरकार,

जो बचत होती हेयरकट में,

उसी से चलता घर-परिवार।


एक रात हिम्मत करके मैंने

चाँद मामा से पूछ ही डाला

आप घटते-बढ़ते रहते हो,

ये फिटनेस प्लान किसने डाला?


हँसकर बोले—“बेटा, सुन लो,

चिंता मत करो कि कुछ अधूरा है

कभी आधा भी चमक जाओ तो

ज़िंदगी के लिए वही पूरा है । 


मैंने कहा लोग दाग़ गिनाते हैं,

बड़ी बारीकी से हर बार,

वह बोले, बिना दाग़ों के

कवि बेरोज़गार हो जाएँगे यार ।


कमियाँ ही पहचान बनती हैं,

छुपाने से कुछ हासिल क्या,

जो अपने जैसे दिखते हैं,

वो अपनों में हैं शामिल क्या ।


मेरी रोशनी तो उधार है,

सूरज से ली है भाई,

पर बाँटते वक्त कभी नहीं सोचा

कितनी है, कितनी आई ।


नहीं सबके बस का

कि सूरज सा हम जलें,

पर चाँद सी ठंढक रखो

और बाँटों जो भी मिले ।


कहकर चाँद ढलने लगा,

मैं सिर सहलाता रहा,

सोचा चाहे आसमान हो या सिर,

चमक का फ़र्ज़ निभाता रहा ।


चाहे मुझे देखो या आसमाँ को

कभी भी आप आज के बाद,

बस ये याद रखना कि

क्या सोचता है ये चाँद ।

तुम मेरा मौन पढ़ो

बातें सब फँसावा है,

लफ़्ज़ तो दुरावा है,

तुम मेरा मौन पढ़ो,

शब्द तो छलावा है।


जो कहा गया है अक्सर

वो सच कम, सलीका ज़्यादा है,

हर वाक्य में मतलब छुपा

और मुस्कान में बस वादा है।


आवाज़ों की इस भीड़ में

सच तो ख़ामोशी में है,

सुन सको तो, हर दलील

इसकी आगोशी में है।


अर्थ तो आँखों से टपकते हैं,

सांसों में उतर जाते हैं,

शब्द तो बस पर्दा हैं

भाव भीतर मर जाते हैं।


कितनी बार बोलते-बोलते

सच ने हार मान ली,

और मौन ने चुपचाप

पूरी कहानी जान ली।


जो समझे बिना कहे

वही अपना कहलाता है,

वरना हर बोले गए शब्द में

कुछ न कुछ गँवाया जाता है।


तो तुम शोर नहीं, ठहराव पढ़ो,

इन पंक्तियों का यही सार है,

बातें सब फँसावा हैं,

मौन ही असली इज़हार है।

अति-सोच

सौ बातों को

रख जेहन में,

पीड़ा हुई जब

व्यथित मन में।


और तब लगा

इस पर भी सोचें—

भई ये अति-सोच

मुझे क्यों दबोचे।


हर छोटी बात

पहाड़ बन जाए,

बीता हुआ कल

आज में घुस आए।

जो था ही नहीं

वो डर बन बैठे,

और मन का सुकून

कोने में सिमट जाए।


सोच के चक्र में

सोच ही पहरा है,

हर सवाल का

सवाल ही घेरा है।


उत्तर मिलता नहीं,

प्रश्‍न घूमता रहता,

मन खुद का ही

कैदी बन फिरता ।


ख़यालों के शोर में

ख्वाब जाने कहाँ खो गया 

और थकान ने कहा

बस बहुत हो गया ।


तब समझ आया

थोड़ा ठहरना सीखें,

हर ख्याल को

सच न मानें, ज़रा देखें।


कुछ बातें बहने दें

जैसे नदी का जल,

लहरों से लड़ना

ज़रूरी तो नहीं हर पल।


कभी मन से कहें—

बस, अब विराम,

और सोच को

दें कभी थोड़ा आराम।


क्योंकि जीना

केवल समझना नहीं,

कभी-कभी

न सोचना भी समाधान है,

कुछ सोचकर

आज ये लिखा

आज का बस

इतना ही ज्ञान है ।

मोड़

चाय अब भी शायद आग पर वैसे ही उबलता होगा जैसे यादें पके आते थे,  वो मेज़ अब भी वहीं होगी, जहाँ चाय के साथ कुछ ख़्वाब रखे जाते थे। कभी कॉफ़ी क...