आसमान में भी एक चाँद है,
मेरे सिर पर भी एक चमकता,
वह रात को निकलता है साहब,
मेरा वाला पूरे दिन दमकता।
वह बादलों से आँख-मिचौनी खेले,
मैं टोपी से हालत ढकता,
वह ठंडक बाँटे चाँदनी में,
मेरा पसीने में तपता।
दोनों गोल, दोनों पर दाग़,
दोनों ही चाँदी जैसा उजला,
आसमान वाले पर शेर लिखे जाते,
और मेरे वाले पर चुटकुला।
आईना रोज़ सच्चाई बोले,
ना कंघी, ना तेल की दरकार,
जो बचत होती हेयरकट में,
उसी से चलता घर-परिवार।
एक रात हिम्मत करके मैंने
चाँद मामा से पूछ ही डाला
आप घटते-बढ़ते रहते हो,
ये फिटनेस प्लान किसने डाला?
हँसकर बोले—“बेटा, सुन लो,
चिंता मत करो कि कुछ अधूरा है
कभी आधा भी चमक जाओ तो
ज़िंदगी के लिए वही पूरा है ।
मैंने कहा लोग दाग़ गिनाते हैं,
बड़ी बारीकी से हर बार,
वह बोले, बिना दाग़ों के
कवि बेरोज़गार हो जाएँगे यार ।
कमियाँ ही पहचान बनती हैं,
छुपाने से कुछ हासिल क्या,
जो अपने जैसे दिखते हैं,
वो अपनों में हैं शामिल क्या ।
मेरी रोशनी तो उधार है,
सूरज से ली है भाई,
पर बाँटते वक्त कभी नहीं सोचा
कितनी है, कितनी आई ।
नहीं सबके बस का
कि सूरज सा हम जलें,
पर चाँद सी ठंढक रखो
और बाँटों जो भी मिले ।
कहकर चाँद ढलने लगा,
मैं सिर सहलाता रहा,
सोचा चाहे आसमान हो या सिर,
चमक का फ़र्ज़ निभाता रहा ।
चाहे मुझे देखो या आसमाँ को
कभी भी आप आज के बाद,
बस ये याद रखना कि
क्या सोचता है ये चाँद ।
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