जब मंदिर-मस्जिद विवाद अदालत तक पहुंचा
और कानून के फैसले का इन्तेजार हो रहा था
तो इस मन में कुछ विचार उमड़े, वो ही नीचे की पंक्तियों में वर्णित हैं-
थी मेरे दिल की
एक अनबुझी प्यास,
ईश्वर अवश्य करेगा पूरी
ऐसी थी मन को आस,
पर टूटी आख़िरी उम्मीद
हुआ लाचार मन उदास,
जब एक खबर सुनी
कानों ने यूँ ही अनायास,
खुद के आशियाने की
ईश्वर को जो तलाश,
कर रहा वो खुद ही
क़ानून की कयास.
मन के अन्दर जब कुछ ऐसे विचार भाव आते हैं जो कि कलम को उद्वेलित करते हैं कि उनको कविता, छंद, मुक्तक या यूँ ही एक माला में पिरो दूँ !! कुछ ऐसे ही विचारों का संग्रह किया है यहाँ पर !
Wednesday, September 29, 2010
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