कब तक बस यूँ ही
चलते जाना है?
अमूल्य मानव जीवन
के बेशक़ीमती पल
बीत रहे बेमकसद,
क्या हमारा लक्ष्य
सब कुछ खो कर बस
'हाथ का मैल' पाना है?
कब तक बस यूँ ही
चलते जाना है?
कौन मित्र कौन शत्रु
सबके इतने सारे चेहरे
असलियत जान पाना मुश्किल,
आस्तीन के साँप कई यहाँ
कब तक इंसानियत के नाम पर
सबको गले से लगाना है?
कब तक बस यूँ ही
चलते जाना है?
आधुनिकता के दौर में
ग्लोबल नेटवर्क से तो
संपर्क अटूट है,
बहुत से मसले खुद से हैं
थोड़ा समय मिले तो
अपने आप से बतियाना है.
कब तक बस यूँ ही
चलते जाना है?
हौसले गर हो बुलंद
और इरादे हो जब मजबूत
समय लेता इम्तिहान बड़े,
ईश्वर का खेल तो देखो
आग वहीं लगती है
जहाँ 'दीपक' का आशियाना है.
कब तक बस यूँ ही
चलते जाना है?
बहुत सुन्दर !!!
ReplyDeleteक्या हमारा लक्ष्य
सब कुछ खो कर बस
...'हाथ का मैल' पाना है?
इन पंक्तियों की सार्थकता प्रभावित करती है...
मूल्यों को ताक पर रख हम किस दिशा में बढ़ रहे हैं.... सोचनीय है!
धन्यवाद अनुपमा जी. आप जैसे सुधी कवियों की सराहना मुझ जैसे बाल कवियों को प्रोत्साहित करती है.
ReplyDeleteदीपक! बहुत अच्छे विषय को आपने बहुत सहजता से अभिव्यक्त किया है. आपकी यह रचना मुझे बहुत अच्छी लगी.
ReplyDeleteDEEPAK ji aap ke vichar achar hamesha hi prerit karte rahe hai
ReplyDeleteKun ki aah vahi lagati jaha DEEPAK ka ashiyana hai
abhay
Thanks Abhay bhai,
ReplyDeleteaap logon ka protsahan hi ti meri urja hai.
वा, एकदम मार्मिक
ReplyDeleteबहुत सुंदर,खास ये है कि लोगों को ये समझना है खण मंजिल है क्या पाना है,बस चलते जाना है।यहां चलते जाना मतलब उम्र का बीत जाना है।
ReplyDeleteबहुत बहुत धन्यवाद चाचाजी...
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