Wednesday, September 29, 2010

आख़िरी आस

जब मंदिर-मस्जिद विवाद अदालत तक पहुंचा
और कानून के फैसले का इन्तेजार हो रहा था
तो इस मन में कुछ विचार उमड़े, वो ही नीचे की पंक्तियों में वर्णित हैं- 

थी मेरे दिल की
एक अनबुझी प्यास,

ईश्वर अवश्य करेगा पूरी
ऐसी थी मन को आस,

पर टूटी आख़िरी उम्मीद
हुआ लाचार मन उदास,

जब एक खबर सुनी
कानों ने यूँ ही अनायास,

खुद के आशियाने की
ईश्वर को जो तलाश,

कर रहा वो खुद ही
क़ानून की कयास.

Sunday, September 26, 2010

कभी तो समझ पाते

आँखो में आयी दिल की वो बात,
काश तुम कभी तो समझ पाते.

तुझे देखते ही मेरे दिल का खिल जाना,
इतनी खुशी मानो जन्नत ही मिल जाना.

बिछूड़ते वक़्त वो मायूस से दूर खड़े हम,
रोम-रोम से टपकता वो विदाई का गम.

पागल दिल के वो बेकरार हालात,
काश तुम कभी तो समझ पाते.


परंपराओं के खिलाफ वो विद्रोही तेवर,
पर मौन मेरे होठों के कीमती जेवर.

दिल की बात जान को ही ना कह पाना,
कहते कहते बस यूँ ही चुप रह जाना.

मेरा जीवन हर साँस तेरी ही सौगात,
काश तुम कभी तो समझ पाते.


तेरी हर खुशी में मेरी आँखो की हँसी बेपर्द,
तेरी हर मायूसी में नम मेरे दिल के वो दर्द.

सदियों तक राह तकने को मेरी आँखे तैयार,
बेचैन दिल को बस तेरी आस तेरा ही इंतजार.

मेरे धड़कन के वो तड़पते ज़ज्बात,
काश तुम कभी तो समझ पाते.

Saturday, September 25, 2010

वजन ईमानदारी का

वजन करने की मशीन स्टेशन पर दिखी जब,
कितना भारी हुआ हूँ जानने की इच्छा हुई तब.

सिक्का डाला तो रिज़ल्ट निकलकर सामने आया,
जिसे पढ़कर मेरा मन थोड़ा सा चकराया.

सामने साफ दिख रहा था कि मैं हो गया हूँ भारी,
नीचे लिखा था- "आपके व्यक्तित्व की पहचान है ईमानदारी.

दोनो सच है इस पर नही हो रहा था विश्वास,
क्यूंकी दोनो बातों में था एक अजीब विरोधाभास.

भार के बारे में अब पुराना चलन नहीं रहा,
ईमानदारी में भई आजकल वजन नहीं रहा.

मंहगाई-मिलावट के जमाने में पौष्टिक खाना पाने से रहे,
इस कारण सिर्फ़ खाना खाकर तो हम मुटाने से रहे.

मंहगाई तो आजकल आसमान को छुने लगी है,
पानी भी तो बोतल बंद होकर मिलने लगी है.

शायद ये भी हो कल को आसमान में सूरज भी ना उगे,
कोई कंपनी उसे खरीद ले और धूप मुनाफ़े पे बेचने लगे.

यह सब सोच कर ये लगा यह मशीन मज़ाक कर रही है,
या फिर यह भी एक आदमी की तरह बात कर रही है.

आदमी रूपी वाइरस इसके अंदर प्रवेश कर गया है,
इसीलिए अब ये भी चापलूसी करना सीख गया है

इसबार मशीन को चेक करने के लिए सिक्का डाला,
पर अबकी तो उसने चमत्कार ही सामने निकाला,

मेरा वजन तो फिर से उतना ही दिखा था,
पर नीचे में तो कुछ अजब ही लिखा था.

लिखा था- "आप ऊँचे विचार वाले सुखी इंसान हैं"
मैं सोचा अजीब गोरखधंधा है कैसा व्यंग्यबाण है.

विचार ऊँचे होने से भला आज कौन सुखी होता है,
सदविचारी तो आज हर पल ही दुखी होता है.

बुद्ध महावीर के विचार अब किसके मन में पलते हैं,
गाँधीजी तो आजकल सिर्फ़ नोटों पर ही चलते हैं.

ऊँचा तो अब सिर्फ़ बैंक बॅलेन्स ही होता है,
नीतिशास्त्र तो किसी कोने में दुबक कर रोता है.

सदविचार तो आजकल कोई पढ़ने से रहा,
जिसने पढ़ लिया उसका वजन बढ़ने से रहा.

आइए आपको अब सामाजिक वजन बढ़ने का राज बताते हैं,
जब हम दूसरों पे आश्रित होते हैं लदते हैं तभी मूटाते हैं.

नेता जनता को लूटते हैं और वजन बढ़ाते हैं,
साधु भक्तों को काटते हैं अपना भार बढ़ाते हैं.

बड़े साहेब जूनियर्स को काम सरकाते हैं इसलिए भारी कहलाते हैं,
कर्मचारी अफ़सर पर काम टरकाते हैं इसलिए भारी माने जाते हैं.

नहीं होता आजकल वजन किसी ईमानदार सदविचारी का,
हलकापन है नतीजा आज मेहनत, ईमान और लाचारी का.

Tuesday, August 31, 2010

कछुआ फिर जीत गया?

आख़िर कब तक खरगोश द्वारा किए जा रहे उपहासों तथा अपमानजनक टिप्पणियों को कछुआ बर्दाश्त करता. वा तैश में आकर बोला, "क्या तुम्हे पता नही है की मेरे पूर्वज ने पूरी खरगोश जाती का घमंड चकनाचूर कर दिया था? मेरी गति का उपहास उड़ाने से पहले उस रेस की बात याद करो."

"वो बात बहुत पुरानी हो गयी है. यह जमाना मॉडर्न है. "स्लो एंड स्टीडी विन्स द रेस" (जी हाँ आज का खरगोश अँग्रेज़ी भी जानता है) आज के लिए सत्य नही है. वो पुरानी हार अति आत्मविश्वास के कारण हुई थी. अगर तुम्हे लगता है की तुम मुझे हरा सकते हो तो क्यों ना फ़ैसला रेस के मैदान मे हो जाए." खरगोश ने कछुए को चुनौती दी.

कछुए का खून भी गरम था. उसने चुनौती स्वीकार कर ली, "ठीक है. आज से ठीक एक महीने के बाद हमारे बीच दौड़ होगी. खरगोश मन ही मन मुस्कुराने लगा. उसे अपनी जाती पर बहुत दिनों से चला आ रहा कलंक धोने का सुअवसर मिल गया था. ऐसा कर वा ना सिर्फ़ अमर हो जाएगा बल्कि नया इतिहास लिख सकता है, यह सोचकर उसकी खुशियों का ठिकाना ना था.

जोश मे आकर कछुए ने खरगोश की चुनौती तो स्वीकार कर ली थी परंतु अब उसके पसीने छूट रहे थे. उसे इस वास्तविकता का अहसास था की बिना खरगोश की ग़लती के उसका रेस जीतने की बात सोचना वैसा ही है जैसा की भारत का ओलंपिक मे स्वर्ण जीतना. अब उसकी सारी आशाएँ इसी बात पर टिकी थी की खरगोश फिर से अति आत्मविश्वास मे कोई ग़लती करे.

फिर भी कछुए ने अभ्यास पूरे जोश से आरंभ कर दिया. एक विदेशी प्रशिक्षक की देख रेख में उसकी पूरी दिनचर्या शुरू हो गयी. उसे विदेशी प्रशिक्षक रखने की प्रेरणा अपने देश के खिलाड़ियों से मिली जो घर की मुर्गी....मेरा मतलब देश के प्रशिक्षकों से प्रशिक्षण लेने में अपना अपमान समझते हैं. कछुए ने अपने खान पान में भी पौष्टिक आहारों पर विशेष ध्यान देना आरम्भ कर दिया था.

खरगोश और कछुए के बीच दौड़ होने की खबर जल्दी ही हर तरफ फैल गयी.पुरानी दौड़ जिसमें कछुए की खरगोश पर जीत सभी ने एक शिक्षाप्रद कहानी के रूप में सबने सुनी अथवा पढ़ी थी. इसलिए इस दौड़ को लेकर सभी लोगों में बहुत उत्सुकता थी.बहुत से लोग जो खुद को नये ख़यालात के समझते थे उनके लिए कछुआ पुराने विचारों का प्रतिनिधित्व करता था. उनके अनुसार आज की तेज रफ़्तार जिंदगी में तेज़ी से आगे बढ़ना ही सफलता का द्वोतक है. वो लोग खरगोश को जीतता हुआ देखना चाहते थे. वहीं तथाकथित पुराने विचार वाले लोगों को यकीन था की आज भी इमानदारी के साथ निरंतर आगे बढ़ने से मंज़िल अवश्य मिलती है. प्रसार माध्यमों में भी इस दौड़ की खूब चर्चा थी.सभी अख़बारों मे यह खबर मुख्य पृष्ठ पर थी.रेडियो तथा सभी टेलिविजन न्यूज़ चैनलों पर इसी से संबंधित समाचार लगातार आ रहे थे. न्यूज़ चैनलों का तो मानो और किसी खबर की ओर ध्यान ही नही जा रहा था. कोई चॅनेल कछुए के पूरे अभ्यास रूटीन पर रिपोर्ट दिखा रहा था, कोई उसके विदेशी प्रशिक्षक से कछुए की जीत की संभावनाओं के बारे में पूछ रहा था तो कोई खरगोश के परिवार के सदस्यों के इंटरव्यू ले रहा था.

एक चॅनेल पर इंटरव्यू के दौरान खरगोश ने दौड़ में अपनी जीत को सिर्फ़ औपचारिकता करार देते हुए कहा की उसके और कछुए के बीच कोई मुकाबला है ही नही. उसने कहा की शक है की कछुआ दौड़ जीतने के लिए शक्तिवर्धक दवा (ड्रग्स) ले सकता है. इसलिए दौड़ के पहले डोप टेस्ट अनिवार्य रूप से होना चाहिए. उसकी बात को मान कर डोप टेस्ट की व्यवस्था कर दी गयी.

इस दौड़ के प्रति लोगों की उत्सुकता के कारण सट्टा बाज़ार में भी इस रेस के भाव खोल दिए गये. लोगों का उत्साह क्रिकेट मैचों से ज़्यादा इस रेस की ओर था. प्रायः सभी लोग खरगोश की जीत पर ही दाँव लगा रहे थे. वैसे लोग जिन्हे "पुराने विचारों" में विश्वास था वो भी कछुए की जीत की भविष्यवाणी तो कर रहे थे पर जीत पर दाँव लगाने से डर रहे थे.

सट्टा बाज़ार के मालिक को यह पता था की अगर खरगोश हार जाए तो फिर उसे कभी सट्टे के व्यापार में रहने की ज़रूरत ना पड़े इतना धन मिल जाएगा. इसी सोच में वो दौड़ के एक दिन के पहले खरगोश से मिलने गया. अपना परिचय देने के बाद बोला, " मैं ये जानता हूँ की यह दौड़ तुम्हारे लिए प्रतिष्ठा की दौड़ है. परंतु आज के समाज मे असली प्रतिष्ठा धन को मिलती है. अगर तुम यह दौड़ जान बुझ कर हार जाओ तो मैं तुम्हे इतना धन दूँगा की फिर तुम्हे जिंदगी भर चलने की भी आवश्यकता नही होगी."

"परंतु जानबूझकर हारना तो भ्रष्टाचार है. एक तो ऐसे ही कछुए से हारने के बाद मेरी आँखे नीचीं होगी और फिर भ्रष्टाचार में लिप्त होने से तो मैं किसी को मुँह भी नही दिखा सकूँगा." खरगोश के मन में धन लोभ जागृत हो चुका था.

"ये तो सारा संसार जानता है की तुम कभी भी कछुए को हरा सकते हो. वो अगर अपनी रफ़्तार को ड्रग्स की मदद से दस गुना बढ़ा ले तो भी तुम्हे हरा नही सकता. तुम्हे अपनी बिरादरी के कलंक को ढोने के मौके आगे भी मिल जाएँगे पर करोड़पति बनने का यह सुनहार अवसर फिर नही मिलेगा. और फिर तुम रेस हार कर अपनी हानि करोगे तो यह भ्रष्टाचार कैसे होगा? यहाँ तो लोग दूसरों के हिस्से के धन का घपला करने के बाद भी सर उठा के घूमते हैं. कभी सपने में भी नही सोचते की वो भ्रष्टाचार मे लिप्त हैं. जिन्हे जनता अपने हितों की रक्षा के लिए चुन कर भेजती है और जिन पर जनता के धन की रखवाली की ज़िम्मेदारी होती है वो भी तमाम तरह के व्यभिचार कर के बस अपना घर भरने में लगे रहते हैं. तुम अगर अपना नुकसान करके धन अर्जित करोगे तो यह भ्रष्टाचार कैसे हो सकता है." सत्ता मालिक ने अपना आखरी दाँव खेला.

परंतु खरगोश निर्णय नही कर पा रहा था. उसने पिछले एक महीने से सपने मे अपनी विजयी तस्वीर देखी थी. धन का लोभ किसे नही रहता पर कछुए से हार जाना यह बात उसके गले इतनी जल्दी नही उतर पाएगी यह सट्टा मालिक भी जानता था.

रेस देखने के लिए भारी भीड़ इकट्ठा हुई थी. भीड़ को संभालने के लिए पुलिस प्रंबंध कम पड़ रहे थे. टीवी चॅनेल दौड़ का सीधा प्रसारण कर रहे थे. दौड़ जब शुरू हुई तो खरगोश एक पलक मे काफ़ी आगे निकल गया. कछुआ अपनी मंद गति से आगे बढ़ने लगा, इस उम्मीद में की शायद खरगोश रास्ते में उसे कहीं सोता हुआ मिल जाए. परंतु जब काफ़ी दूरी के बाद उसे खरगोश नज़र नही आया तो उसे अपनी हार की निश्चितता का आभास होने लगा. पर जब वो मंज़िल पर पहुँचा तो खरगोश वहाँ भी नही था. सभी कछुए के जीत के नारे लगाने लगे. कछुए को अपनी जीत पर यकीन नही आ रहा था. पर खरगोश कहाँ था? कछुए की नज़रें उसे ही खोज रही थी. वो उसका पराजित चेहरा देखने को बेचैन हो रहा था.

तभी उसे वा सट्टा मालिक की कार मे बैठा आता हुआ दिखाई दिया. दोनो की नज़रें मिली. कछुए की चहेरे पे विजयी मुस्कान थी पर वो यह नही समझ पा रहा था की खरगोश के चहेरे की मुस्कान का राज क्या है?

अब निर्णय आपको करना है की जीत किसकी हुई? कछुए की या खरगोश की? पर यह याद रखिएगा की आपका निर्णय आपके नैतिक मूल्यांकन का आधार होगा.

Saturday, August 28, 2010

पंडितजी का स्वाइन फ्लू

पंडितजी सुबह से छींक छींक कर थे हैरान परेशान
होश उड़ गए थे, कुछ भी नहीं था उन्हें भान,
बदन दुःख रहा था पूरा, आँखों से आ रहा था पानी
कब का भूल चुके थे जिसे, याद आ गयी उनको वो नानी.

क्या हुआ कैसे हुआ, इस सोच में उलझे थे बेचारे
लग गया डॉक्टर का चक्कर, दिख गया दिन में ही तारे,
नब्ज टटोला डॉक्टर ने और आँख मुंह का जाँच किया
और फिर जो बोला तो उनके ऊपर वज्रपात किया.

"पंडितजी ये आपको कैसे इस बीमारी ने जकड़ा
लगता है आपको तो स्वाइन फ्लू ने है पकड़ा,
पर चिंता मत करो अभी तो रोग की शुरुआत है
आप पूरी तरह ठीक हो जायेंगे बस दो दिन की बात है.
बस मैं जो दवाएं दे रहा हूँ आप उसे खाइए
पर ये रोग हुआ आपको, कैसे ये हमें बताइए,
ख़बरें देखते नहीं क्या आप, सावधानियों का रखना है ख्याल
भीड़ भाड़ वाले इलाकों में बंधना है मुंह नाक पर रुमाल.
हरेक शक सुबहा वाले व्यक्ति से छह फीट की दूरी रखना जरुरी है
और ऐसे में छुआ-छूत का पालन करना हमारी मज़बूरी है"

पंडितजी बोले- "मैंने तो सावधानियां बरती सारी हैं
वो सभी उपाय करता हूँ जिसकी मुझे जानकारी है,
और फिर छुआ-छूत का ध्यान रखना तो मज़बूरी नहीं मेरा धर्म है
डॉक्टर साहब, इसका पालन करना तो हमारा नित्य कर्म है.
पूजा पाठ भक्ति भाव मेरा धर्म मेरा ज्ञान है
अपना धर्म कैसे पवित्र रखना है इसका मुझे भान है"

डॉक्टर ने बीच में ही टोका- "खोखला है आपका ज्ञान सारा
विकास की दौड़ में आप जैसों के कारण ही पीछे है भारत हमारा,
अगर  छुआ-छूत भेद भाव को आप मानते अपना धर्म है
तो आप एक भारतीय हो इसपे भी मुझे शर्म है.

जाति धर्म और भाषा के आधार पर हम आपस में अंतर रखते हैं
और फिर भी विश्व महाशक्ति बनने का दिवास्वप्न देखते हैं,
मेरे इक्कीसवीं सदी के भारत की हालत आज पस्त है
क्यूंकि शिक्षित वर्ग की आधी आबादी भी छुआ-छूत के रोग से ग्रस्त है.

आप स्वाइन फ्लू को भूल जाओ ये तो मामूली बीमारी है
पर मैं आपको ठीक नहीं कर सकता, आपको तो भयंकर महामारी है".

Tuesday, August 24, 2010

शादी करा दो

मेरे मित्र भाई बनवारी लाल, 
हरदम रहते हैं बड़े बेहाल
चेहरे पे परेशानी हरपल हैरान,
बहुत कम दिखती उनके होठों पे मुस्कान
सारांश में आप समझ ही गए होंगे,
बनवारी हैं एक आम शादीशुदा इंसान

पर बनवारी शादी से पहले ऐसे न थे,
चूसे हुए आम के जैसे न थे
उनके चहरे पे भी रहती थी बहार,
हरदम खिलती थी हंसी की बयार
पर उनके पाणिग्रहण ने जुल्म ढाया,
चमकते चंद्रमुख पर ग्रहण छाया.
शाहरुख़ के समान उनकी थी खूबसूरत काया 
इस सांस्कृतिक कार्यक्रम ने ए के हंगल बनाया.

फिर भी जब कभी वो मुझे मिल जाते हैं
शादी कर लो की रट लगाते हैं.
कहते हैं अपना बैंड बाजा जल्दी बजबाओ,
पछताना ही है तो लड्डू खा के पछताओ
बोलते हैं पत्नी होती है लक्ष्मी का रूप,
खिला देगी जीवन में सुनहरी धूप
कदम पड़ते ही दुनिया संवर जाएगी,
अरे जिंदगी खुशियों से भर जाएगी


मैं बोला बनवारीजी आँखें खोलो अपनी,
और छोडो बेगम का पल्लू
ये लक्ष्मियाँ हैं माना, पर आपको समझती हैं
ये अपना वाहन उल्लू

बनवारी बोले शादी तो पवित्र बंधन है,
सेवा करने साथ निभाने का वचन है
मैं बोला आज खून के रिश्ते भी हो गये हैं फिज़ूल,
और जब यहाँ अपने माँ बाप को ही जाते सब भूल,
फिर कौन भला जिंदगी भर साथ निभाता है,
आधुनिक राम वनवास को अकेले ही जाता है.
भई हम कुंवारों की चिंता में ऊर्जा मत गवाओं,
करानी है तो कुछ अहम् शादियाँ कराओ


मिलन कराओ पहले भूखे का रोटी के साथ,
अधनंगो के फेरे कराओ साडी धोती के साथ
राजा का निकाह करा दो जिम्मेवारी से,
प्रजा का विवाह कराओ ईमानदारी से
दुखी चेहरों का मिलन करा दो मुस्कान से,
पहले इंसानियत की शादी कराओ इंसान से

आज इनका एक दूसरे से हो गया है तलाक,
और इसी कारण हमारा देश हो रहा है खाक
पहले इनका मिलन कराओ ये शादियाँ जरुरी हैं,
हमारी तुम्हारी शादी तो समझौता है मज़बूरी है.

Friday, August 20, 2010

तुम ही कहो

Independence या 
In Dependence...?? 
क्या कहूँ ! तुम ही कहो....

आज आमजन के लिए हर मुकाम पे गुलामी है
कब तक ये सब अत्याचार सहूँ ! तुम ही कहो

सब को यहाँ बस अपनी ही फ़िक्र है आजकल
देश अपना चला है किस चहूँ ! तुम ही कहो

आमजन के करूण क्रंदन, नेताओं का फिर भी वंदन,
स्वतंत्र  हूँ या हूँ अब भी बंदित, क्या कहूँ ! तुम ही कहो

क्रांति के स्वर विकल हैं स्वार्थ के बियाबान में
धारा के विपरीत एक दुर्बल कैसे बहूँ ! तुम ही कहो

वैचारिक मुफ़लिसी में है आज मंदिर भी मस्जिद भी
गदर के लिए किस धर्म की शरण गहूँ ! तुम ही कहो

मन में उथल पुथल मचती हो जब नग्न व्यभिचार पर
व्यक्त करूँ दिल की व्यथा या चुपचाप रहूँ ! तुम ही कहो

नमन माटी के उन सपूतों को

जिनके लहू की हर बूँद से, भारत स्वर्णिम परिवेश हुआ, नमन माटी के उन सपूतों को, जिनसे रोशन देश हुआ। १ जिनने हँसकर प्राण दिए थे, माँ की लाज बचान...