उसकी नज़रों को मेरा इंतेजार होता
शायद मैं कभी इस काबिल ही ना था.
पर दर्द भी था दिल को बिछूड़ने का
उससे जो कभी हमें हासिल ही ना था.
मन के अन्दर जब कुछ ऐसे विचार भाव आते हैं जो कि कलम को उद्वेलित करते हैं कि उनको कविता, छंद, मुक्तक या यूँ ही एक माला में पिरो दूँ !! कुछ ऐसे ही विचारों का संग्रह किया है यहाँ पर !
चाय अब भी शायद आग पर वैसे ही उबलती होगी और यादें पके आते थे, वो मेज़ अब भी वहीं होगी, जहाँ चाय के साथ कुछ ख़्वाब रखे जाते थे। कभी कॉफ़ी के...
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