Saturday, February 16, 2013

तकदीर

जिनके रंग से खिलती थी मुस्कानें जहाँ की,
उन्ही आँखों में सूख गयीं सारी आशाएँ अब।
कैसे बताएँ जमाने को वजह अपने गम की,
खुद को ही ना मालूम अपने उदासी का सबब।।


जिंदगी जो कभी हुआ करती थी सुनहरी सुबह,
आज वही ठहर कर धूमिल सांझ हो गयी है।
खुशियों के आगमन की उम्मीद ही है बेमानी
इस माने में अब तकदीर ही बांझ हो गयी है।।

कभी हम भी जिया करते थे अपनी शर्तों पर,
भरोसा था तो दिल को बस तदबीरों में।
जिंदगी ने पाठ कुछ यूँ पढाये हैं 'दीपक'
हंसी ढूंढता हूँ मैं अब हाथ की लकीरों में।।

कुछ नहीं

बे-तलब तुम कहते कुछ नही बा-अदब हम कहते 'कुछ नहीं'!  आंखों में किताब है पूरी लब क्यूं कहते कुछ नहीं? बातों का मौसम भी हो तब क्यूं कहत...