Sunday 17 March 2013

भाव मिलता नहीं, अब प्रेम-भाव को

बिसात शतरंज की, बूझो तुम दांव को,
मिर्चियाँ आँखों में, मत दिखा घाव को,
बोलियाँ लगती आज तीर-तलवार पर,
भाव मिलता नहीं, अब प्रेम-भाव को।

छोड़ दे भोलापन, भूल जा गाँव को,
लहरें विकराल हैं, थाम ले नाव को,
क्या पता है कहाँ पे छुपा जलजला,
रखना देख भाल के तुम यहाँ पांव को।

जोड़ ले दिल दे दिल, तोड़ ठहराव को,
अश्क अनमोल है, रोक इस बहाव को,
स्वार्थ ने  है किया तुझको मुझसे अलग,
कर ले आलिंगन, छोड़ अलगाव को।

पुण्य पावन चरण, भूखे बर्ताव को,
रोये उनका ह्रदय, देख बदलाव को,
सर पे बूढी जो डाली न भाये तुझे,
कल तरसोगे तुम ठंडी सी छाँव को। 

Saturday 16 March 2013

फागुन का मस्ती रस



"साधू ने भी मस्ती में शराब चढ़ा लिया,
 

चचा ने भी मुच्छी पे खिजाब लगा लिया,
 

फाग का रंग सब पे यूँ चढ़ा है 'दीपक',
 

मुर्गे ने भी डिनर में कबाब मंगा लिया !"

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"भले दिमाग़ हो न्यूटन-आर्यभट्ट से सवा सेर,
 

रुस्तम-गामा को भी करते हो दो पल में ढेर,
 

भंवरजाल ये ऐसा कि हार गये भगवंता भी
 

चूहे बन जाते शादी के बाद सारे बब्बर शेर."

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Friday 8 March 2013

नारी दिवस: कुछ मुक्तक



शबरी बन अनूठा दुलार भी करती है,
सीता बन सब स्वीकार भी करती है,
नारी को अबला मत समझना कभी
चंडी बन दुर्जन संहार भी करती है !
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समता की दुहाई, बराबरी का रोना,
'नारियाँ हैं आगे', 'लड़कियाँ हैं सोना',
अपना सम्मान नहीं चाहती तू खोना,
पर खुद के घर में लड़का ही होना?
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नारियों की इज़्ज़त जो करते तुम फ़ना,
हे अधम, इक बात ज़रूर याद रखना,
जिस ईश्वर की करते तुम हो पूजा,
उस राम-कृष्ण को नारी ने ही जना !
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नारी दिवस का बस एक दिन,
और वर्ष भर नारी का अपमान !
गर बनाना तुझे स्वर्ग धरा को,
करो हर पल उनका सम्मान !!
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कभी माता तो कभी बहन के रूप में,
कभी पत्नी, कभी बेटी के स्वरूप में,
देती ना संबल जो नारी हर पल,
जल जाता नर जीवन की धूप में !

Wednesday 6 March 2013

तो और बात है !!!

नींद को सपनों से तो सब लोग सजाते,
ख्वाब खुली आँखों में पले तो और बात है !

आवाज से आवाज तो कुँए भी मिलाते,
संग तेरे कदम भी चले तो और बात है !

कहीं नारे, कहीं धरने, कहीं कैंडल जलाते,
खून आँखों से जो उबले तो और बात है !

हसीनों की अदाओं पे हम मरते औ मिटाते,
दिल देश की खातिर मचले तो और बात है !

पाठ ईमान-धरम का वो सबको हैं पढ़ाते,
आगाज खुद से हो पहले तो और बात है !

ग़दर की राह क्यूँ बस औरों को ही दिखाते,
'आजाद' तेरे घर से निकले तो और बात है !

ये कैसी नीति !!!

जब एक बुजुर्ग नेताजी ने ओसामा को 'ओसामा जी' कहा था तो खून तो गरम हुआ था पर ये सोचा कि शायद वो सठिया गए हैं वरना राजनीति में ऐसी गिरावट की उम्मीद न की थी ! परन्तु जब एक ऐसे युवा राजनेता जिनसे भारत की नौजवान पीढ़ी को बहुत आशाएं हों वो भी उसी राह पे चल दें तो फिर ......... तो फिर???? ये बहुत जटिल प्रश्न बन जाता है-----

"उम्मीद के उगते सूरज को कीचड़ में तब सना दिया,
 

जब वोट को, कुर्सी को- ही तुमने मजहब बना लिया ।
 

अब मेरे देश की, कानून की भला क्या रही इज्जत,
 

संसद के लुटेरों को ही तूने जो 'साहब' बना दिया ।।"