बे-तलब तुम कहते कुछ नही
बा-अदब हम कहते 'कुछ नहीं'!
आंखों में किताब है पूरी
लब क्यूं कहते कुछ नहीं?
बातों का मौसम भी हो
तब क्यूं कहते कुछ नहीं?
हमने कुछ ना चाहा कभी
कब तुम कहते, 'कुछ नहीं'!
कहते रहते सब कुछ हैं
हम यूं कहते 'कुछ नहीं'!
सुनने को हैं व्याकुल कान
अब क्यूं कहते कुछ नहीं?
सदा नपे-तुले, सधे शब्द ही
बेढब क्यूं कहते कुछ नहीं!
सोचा हर-सू तेरे शब्द क्यूंकि
बे-सबब तुम कहते कुछ नहीं!
बोले भी तो शब्द अनबुझे
मतलब तुम कहते कुछ नहीं!
हम कैसे सब समझ लें
जब तुम कहते कुछ नहीं !
बहोत खूब ।
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