Saturday 18 December 2010

कब तक

कब तक बस यूँ ही
चलते जाना है?
  
अमूल्य मानव जीवन
के बेशक़ीमती पल
बीत रहे बेमकसद,
क्या हमारा लक्ष्य
सब कुछ खो कर बस
'हाथ का मैल' पाना है?
  
कब तक बस यूँ ही
चलते जाना है?
  
कौन मित्र कौन शत्रु
सबके इतने सारे चेहरे
असलियत जान पाना मुश्किल,
आस्तीन के साँप कई यहाँ
कब तक इंसानियत के नाम पर
सबको गले से लगाना है?
  
कब तक बस यूँ ही
चलते जाना है?
  
आधुनिकता के दौर में
ग्लोबल नेटवर्क से तो
संपर्क अटूट है,
बहुत से मसले खुद से हैं
थोड़ा समय मिले तो
अपने आप से बतियाना है.
  
कब तक बस यूँ ही
चलते जाना है?

हौसले गर हो बुलंद
और इरादे हो जब मजबूत
समय लेता इम्तिहान बड़े,
ईश्वर का खेल तो देखो
आग वहीं लगती है
जहाँ 'दीपक' का आशियाना है.
  
कब तक बस यूँ ही
चलते जाना है?

Wednesday 3 November 2010

कोलाहल

जिंदगी की दौड़ यूँ ही रोजमर्रे की,
मन में मची घमासान हलचल.
बाहर 'सब चलता है' की नीरव शांति,
अंदर 'आख़िर क्यूँ' का कोलाहल.

भौतिकता की इस लंगड़ी दौड़ में,
कैसे हो समाज की मुश्किलें हल.
हर कोई आज बस यही सोच में,
वो खुद नहीं, कोई और करे पहल.

जब तक खुद पे ना बन पड़े,
विरोध का सुर कहाँ निकलता है.
वरना सब के दिल में बस यही स्वर,
कि भई आजकल सब चलता है.

चिंतन यही मन में, कैसे बनेगी,
बिगडती हुई ये बात ये हालात.
आखिर कौन उठाएगा अपना हाथ,
कहाँ से होगी बदलाव की शुरुआत.

Thursday 14 October 2010

वो भला कब दूर होता है

रिश्तों का दिखावा करते जो, उन्हें ही सालता अकेलापन,
नहीं तो जो दिल में रहता है, वो भला कब दूर होता है.

जो मर्ज देता है ज़ालिम, वही है उसका हकीम भी,
बड़ा अजीब भी ये दिल के रोग का दस्तूर होता है.

बेकरार मन को भला कब रहता है किसी भी क़ानून का डर,
बंदिशें सारी नाकाम रहती, जब कोई दिल से मजबूर होता है.

वो शाख जो लदी हो फलों से, झुकी रहती है हमेशा,
जो पूरा ज्ञानी होता है वो नहीं कभी मगरूर होता है.

जिंदगी मे किसी के भी वक़्त सदा एक जैसा नही रहता,
रात कितनी भी अंधियारी हो, सुबह उजाला ज़रूर होता है.

किस्मत से ज़्यादा और समय से पहले कुछ नहीं मिलता,
यह बहाना उनका है जिन्हें तक़दीर का लिखा मंजूर होता है.

लगन और मेहनत की कोई कमी नहीं है इस जहाँ में,
अमर वो होते हैं जिनमें नया करने का फितूर होता है.

बदल रहा है देखो आज इंसाफ़ का मंज़र 'दीपक',
गुनहगार मौज करते हैं, परेशान बेकसूर होता है.

Monday 11 October 2010

लगन दिल की

दीवाना भँवरा मचल जाता है,
पागल परवाना जल जाता है,
दिल की लगी में है वो बात,
पत्थर भी पिघल जाता है.

पत्तों पे पड़ी सुबह की ओस
जैसी कभी इसमें मासूम नमी,
ताज-ओ-तख्त भी हिला दे
ऐसी कभी इसकी ओजस गर्मी.

पावन कशिश की तपन में तो
हिमालय भी दहल जाता है,
दिल की लगी में है वो बात,
पत्थर भी पिघल जाता है.

डगर होती बड़ी ये मुश्किल
कड़ी तपस्या पड़ता है करना,
पवित्र था जानकी का संयम
पड़ा था अग्निपरीक्षा से गुज़रना.

सच्ची हो गर तड़प मिलन की
फिर किसे राजमहल भाता है,
दिल की लगी में है वो बात,
पत्थर भी पिघल जाता है.

दीवानापन था तुलसीदास का
विषधर भी लगा डोर समान,
लगन थी सावित्री की ऐसी
यम से छीन लाई गयी जान.

मीरा की भक्ति हो जाती अमर
भले दुनिया से वो गरल पाता है,
दिल की लगी में है वो बात,
पत्थर भी पिघल जाता है.

Saturday 2 October 2010

बच्चा रे बच्चा !!

डॅडी ने सोचा देखें बेटा कैसा पढ़ रहा है,
मेरा चिराग भविष्य कैसा गढ़ रहा है.
बेटे का टेस्ट लेने को उसे अपने पास बुलाया,
डरा सहमा देख पहले उसको थोड़ा बहलाया.
बोले- बेटा तुम्हें इसलिए अपने पास बुलाया है,
कि देखूं तूने पढ़ाई में कितना मन लगाया है.
पूछूँगा तुमसे दो-चार सवाल बहुत ही आसान,
उत्तर दे दो सही तो पूरे हों दिल के अरमान.

बेटा बोला- क्या आज सूरज पश्चिम में उग आया है,
या फिर लगता है आपको आज बुखार चढ़ आया है.
लगता नहीं मुझे आप अपने होशो हवास में है,
टेस्ट लेंगे, पता भी है बेटा किस क्लास में है.
बाप शरमाया, सच्चाई सुन परेशानी में पड़ गया,
यह देख बेटे का जोश थोड़ा और भी बढ़ गया.
बोला- मेरे या मम्मी के लिए आप समय ही कहाँ पाते हैं,
ऑफीस से बचा वक़्त कॉलोनी के स्मार्ट आंटीज पे लगाते हैं.

बाप गुस्से पे नियंत्रण रख के बोला- साहेबजादे !
बकबक बंद कर ये अपनी और चुपचाप जवाब दे.
बेटा धीरे से बोला- कैसी बातें करते हो आप,
अगर जवाब दूँगा तो कैसे रहूँगा चुपचाप.
बाप बोला- बहुत हो गया ध्यान से सुन अब,
पहला प्रश्न .- हमारा भारत आज़ाद हुआ कब?

बेटा बोला- वैसे तो प्रश्न आसान है, कूल है,
पर माफ़ करें इसमें एक प्रॅक्टिकल भूल है.
अँग्रेज़ों से हमारा देश सन सैंतालिस मे आज़ाद हुआ,
पर आपको तो पता है क्या क्या उसके बाद हुआ.
आज़ाद तो तब जाके होगा ये भारत देश अपना,
जब पूरा होगा गाँधीजी के राम-राज्य का सपना.

बाप बोला- ठीक है, ठीक है, अब है गणित की बारी,
एक काम को 6 दिन में पूरा करते हैं 8 कर्मचारी,
उसी काम को 16 कर्मचारी कितने दिन में करेंगे पूरा?
बेटा बोला- पिताजी आपका ये प्रश्न ही है अधूरा,
पहले बताओ आप बात ज़रा एक फंडामेंटल,
ये काम यहाँ प्राइवेट है या कि है गवर्मेंटल.
गणित के अनुसार तो चाहिए 3 दिन में पूरा हो जाना,
पर काम सरकारी हुआ तो फिर क्या भरोसा क्या ठिकाना.
सारे सिद्धांत सारा गणित रह जाएगा धरा,
शायद महीने में भी काम ना हो पाए पूरा.

बाप दो ही सवाल  पूछ  कर थक  चुका था,
बेटे के अनोखे जवाब से पूरा पक चुका था.
बोले- चल अब मेरे आख़िरी प्रश्न का उत्तर बता,
इंडिया के नॅशनल स्पोर्ट्स का नाम है तुझे पता?
बेटा बोला- जी हॉकी हुआ करता था कभी,
पर हमारा राष्ट्रीय खेल तो भ्रष्टाचार है अभी.
इस खेल में हमने सारे वर्ल्ड रेकॉर्ड्स तोड़ डाला है,
अरे आज हॉकी के अंदर भी इसी का बोलबाला है.
अगर ये खेल ओलंपिक में शामिल कर लिया जाता,
यक़ीनन सारे के सारे मेडल्स इंडिया ही ले कर आता.
अरे हर कोई इस खेल में लगाता है छक्का-चौका,
बस वही नहीं खेलता है जिसे मिला नही हो मौका.

बाप ने अपनो प्रश्नों का पिटारा यहीं पर समेटा,
बोला तू तो बहुत ही बड़ा हो गया है मेरा बेटा.
बेटा बोला- पिताजी आपकी दुनिया बहुत खराब है,
यहाँ हर चेहरे पर लगा हुआ एक नकाब है.
मैं अपना यह सुख चैन खोना नहीं चाहता,
माफ़ करना पिताजी, मैं बड़ा होना नही चाहता.

Wednesday 29 September 2010

आख़िरी आस

जब मंदिर-मस्जिद विवाद अदालत तक पहुंचा
और कानून के फैसले का इन्तेजार हो रहा था
तो इस मन में कुछ विचार उमड़े, वो ही नीचे की पंक्तियों में वर्णित हैं- 

थी मेरे दिल की
एक अनबुझी प्यास,

ईश्वर अवश्य करेगा पूरी
ऐसी थी मन को आस,

पर टूटी आख़िरी उम्मीद
हुआ लाचार मन उदास,

जब एक खबर सुनी
कानों ने यूँ ही अनायास,

खुद के आशियाने की
ईश्वर को जो तलाश,

कर रहा वो खुद ही
क़ानून की कयास.

Sunday 26 September 2010

कभी तो समझ पाते

आँखो में आयी दिल की वो बात,
काश तुम कभी तो समझ पाते.

तुझे देखते ही मेरे दिल का खिल जाना,
इतनी खुशी मानो जन्नत ही मिल जाना.

बिछूड़ते वक़्त वो मायूस से दूर खड़े हम,
रोम-रोम से टपकता वो विदाई का गम.

पागल दिल के वो बेकरार हालात,
काश तुम कभी तो समझ पाते.


परंपराओं के खिलाफ वो विद्रोही तेवर,
पर मौन मेरे होठों के कीमती जेवर.

दिल की बात जान को ही ना कह पाना,
कहते कहते बस यूँ ही चुप रह जाना.

मेरा जीवन हर साँस तेरी ही सौगात,
काश तुम कभी तो समझ पाते.


तेरी हर खुशी में मेरी आँखो की हँसी बेपर्द,
तेरी हर मायूसी में नम मेरे दिल के वो दर्द.

सदियों तक राह तकने को मेरी आँखे तैयार,
बेचैन दिल को बस तेरी आस तेरा ही इंतजार.

मेरे धड़कन के वो तड़पते ज़ज्बात,
काश तुम कभी तो समझ पाते.

Saturday 25 September 2010

वजन ईमानदारी का

वजन करने की मशीन स्टेशन पर दिखी जब,
कितना भारी हुआ हूँ जानने की इच्छा हुई तब.

सिक्का डाला तो रिज़ल्ट निकलकर सामने आया,
जिसे पढ़कर मेरा मन थोड़ा सा चकराया.

सामने साफ दिख रहा था कि मैं हो गया हूँ भारी,
नीचे लिखा था- "आपके व्यक्तित्व की पहचान है ईमानदारी.

दोनो सच है इस पर नही हो रहा था विश्वास,
क्यूंकी दोनो बातों में था एक अजीब विरोधाभास.

भार के बारे में अब पुराना चलन नहीं रहा,
ईमानदारी में भई आजकल वजन नहीं रहा.

मंहगाई-मिलावट के जमाने में पौष्टिक खाना पाने से रहे,
इस कारण सिर्फ़ खाना खाकर तो हम मुटाने से रहे.

मंहगाई तो आजकल आसमान को छुने लगी है,
पानी भी तो बोतल बंद होकर मिलने लगी है.

शायद ये भी हो कल को आसमान में सूरज भी ना उगे,
कोई कंपनी उसे खरीद ले और धूप मुनाफ़े पे बेचने लगे.

यह सब सोच कर ये लगा यह मशीन मज़ाक कर रही है,
या फिर यह भी एक आदमी की तरह बात कर रही है.

आदमी रूपी वाइरस इसके अंदर प्रवेश कर गया है,
इसीलिए अब ये भी चापलूसी करना सीख गया है

इसबार मशीन को चेक करने के लिए सिक्का डाला,
पर अबकी तो उसने चमत्कार ही सामने निकाला,

मेरा वजन तो फिर से उतना ही दिखा था,
पर नीचे में तो कुछ अजब ही लिखा था.

लिखा था- "आप ऊँचे विचार वाले सुखी इंसान हैं"
मैं सोचा अजीब गोरखधंधा है कैसा व्यंग्यबाण है.

विचार ऊँचे होने से भला आज कौन सुखी होता है,
सदविचारी तो आज हर पल ही दुखी होता है.

बुद्ध महावीर के विचार अब किसके मन में पलते हैं,
गाँधीजी तो आजकल सिर्फ़ नोटों पर ही चलते हैं.

ऊँचा तो अब सिर्फ़ बैंक बॅलेन्स ही होता है,
नीतिशास्त्र तो किसी कोने में दुबक कर रोता है.

सदविचार तो आजकल कोई पढ़ने से रहा,
जिसने पढ़ लिया उसका वजन बढ़ने से रहा.

आइए आपको अब सामाजिक वजन बढ़ने का राज बताते हैं,
जब हम दूसरों पे आश्रित होते हैं लदते हैं तभी मूटाते हैं.

नेता जनता को लूटते हैं और वजन बढ़ाते हैं,
साधु भक्तों को काटते हैं अपना भार बढ़ाते हैं.

बड़े साहेब जूनियर्स को काम सरकाते हैं इसलिए भारी कहलाते हैं,
कर्मचारी अफ़सर पर काम टरकाते हैं इसलिए भारी माने जाते हैं.

नहीं होता आजकल वजन किसी ईमानदार सदविचारी का,
हलकापन है नतीजा आज मेहनत, ईमान और लाचारी का.

Tuesday 31 August 2010

कछुआ फिर जीत गया?

आख़िर कब तक खरगोश द्वारा किए जा रहे उपहासों तथा अपमानजनक टिप्पणियों को कछुआ बर्दाश्त करता. वा तैश में आकर बोला, "क्या तुम्हे पता नही है की मेरे पूर्वज ने पूरी खरगोश जाती का घमंड चकनाचूर कर दिया था? मेरी गति का उपहास उड़ाने से पहले उस रेस की बात याद करो."

"वो बात बहुत पुरानी हो गयी है. यह जमाना मॉडर्न है. "स्लो एंड स्टीडी विन्स द रेस" (जी हाँ आज का खरगोश अँग्रेज़ी भी जानता है) आज के लिए सत्य नही है. वो पुरानी हार अति आत्मविश्वास के कारण हुई थी. अगर तुम्हे लगता है की तुम मुझे हरा सकते हो तो क्यों ना फ़ैसला रेस के मैदान मे हो जाए." खरगोश ने कछुए को चुनौती दी.

कछुए का खून भी गरम था. उसने चुनौती स्वीकार कर ली, "ठीक है. आज से ठीक एक महीने के बाद हमारे बीच दौड़ होगी. खरगोश मन ही मन मुस्कुराने लगा. उसे अपनी जाती पर बहुत दिनों से चला आ रहा कलंक धोने का सुअवसर मिल गया था. ऐसा कर वा ना सिर्फ़ अमर हो जाएगा बल्कि नया इतिहास लिख सकता है, यह सोचकर उसकी खुशियों का ठिकाना ना था.

जोश मे आकर कछुए ने खरगोश की चुनौती तो स्वीकार कर ली थी परंतु अब उसके पसीने छूट रहे थे. उसे इस वास्तविकता का अहसास था की बिना खरगोश की ग़लती के उसका रेस जीतने की बात सोचना वैसा ही है जैसा की भारत का ओलंपिक मे स्वर्ण जीतना. अब उसकी सारी आशाएँ इसी बात पर टिकी थी की खरगोश फिर से अति आत्मविश्वास मे कोई ग़लती करे.

फिर भी कछुए ने अभ्यास पूरे जोश से आरंभ कर दिया. एक विदेशी प्रशिक्षक की देख रेख में उसकी पूरी दिनचर्या शुरू हो गयी. उसे विदेशी प्रशिक्षक रखने की प्रेरणा अपने देश के खिलाड़ियों से मिली जो घर की मुर्गी....मेरा मतलब देश के प्रशिक्षकों से प्रशिक्षण लेने में अपना अपमान समझते हैं. कछुए ने अपने खान पान में भी पौष्टिक आहारों पर विशेष ध्यान देना आरम्भ कर दिया था.

खरगोश और कछुए के बीच दौड़ होने की खबर जल्दी ही हर तरफ फैल गयी.पुरानी दौड़ जिसमें कछुए की खरगोश पर जीत सभी ने एक शिक्षाप्रद कहानी के रूप में सबने सुनी अथवा पढ़ी थी. इसलिए इस दौड़ को लेकर सभी लोगों में बहुत उत्सुकता थी.बहुत से लोग जो खुद को नये ख़यालात के समझते थे उनके लिए कछुआ पुराने विचारों का प्रतिनिधित्व करता था. उनके अनुसार आज की तेज रफ़्तार जिंदगी में तेज़ी से आगे बढ़ना ही सफलता का द्वोतक है. वो लोग खरगोश को जीतता हुआ देखना चाहते थे. वहीं तथाकथित पुराने विचार वाले लोगों को यकीन था की आज भी इमानदारी के साथ निरंतर आगे बढ़ने से मंज़िल अवश्य मिलती है. प्रसार माध्यमों में भी इस दौड़ की खूब चर्चा थी.सभी अख़बारों मे यह खबर मुख्य पृष्ठ पर थी.रेडियो तथा सभी टेलिविजन न्यूज़ चैनलों पर इसी से संबंधित समाचार लगातार आ रहे थे. न्यूज़ चैनलों का तो मानो और किसी खबर की ओर ध्यान ही नही जा रहा था. कोई चॅनेल कछुए के पूरे अभ्यास रूटीन पर रिपोर्ट दिखा रहा था, कोई उसके विदेशी प्रशिक्षक से कछुए की जीत की संभावनाओं के बारे में पूछ रहा था तो कोई खरगोश के परिवार के सदस्यों के इंटरव्यू ले रहा था.

एक चॅनेल पर इंटरव्यू के दौरान खरगोश ने दौड़ में अपनी जीत को सिर्फ़ औपचारिकता करार देते हुए कहा की उसके और कछुए के बीच कोई मुकाबला है ही नही. उसने कहा की शक है की कछुआ दौड़ जीतने के लिए शक्तिवर्धक दवा (ड्रग्स) ले सकता है. इसलिए दौड़ के पहले डोप टेस्ट अनिवार्य रूप से होना चाहिए. उसकी बात को मान कर डोप टेस्ट की व्यवस्था कर दी गयी.

इस दौड़ के प्रति लोगों की उत्सुकता के कारण सट्टा बाज़ार में भी इस रेस के भाव खोल दिए गये. लोगों का उत्साह क्रिकेट मैचों से ज़्यादा इस रेस की ओर था. प्रायः सभी लोग खरगोश की जीत पर ही दाँव लगा रहे थे. वैसे लोग जिन्हे "पुराने विचारों" में विश्वास था वो भी कछुए की जीत की भविष्यवाणी तो कर रहे थे पर जीत पर दाँव लगाने से डर रहे थे.

सट्टा बाज़ार के मालिक को यह पता था की अगर खरगोश हार जाए तो फिर उसे कभी सट्टे के व्यापार में रहने की ज़रूरत ना पड़े इतना धन मिल जाएगा. इसी सोच में वो दौड़ के एक दिन के पहले खरगोश से मिलने गया. अपना परिचय देने के बाद बोला, " मैं ये जानता हूँ की यह दौड़ तुम्हारे लिए प्रतिष्ठा की दौड़ है. परंतु आज के समाज मे असली प्रतिष्ठा धन को मिलती है. अगर तुम यह दौड़ जान बुझ कर हार जाओ तो मैं तुम्हे इतना धन दूँगा की फिर तुम्हे जिंदगी भर चलने की भी आवश्यकता नही होगी."

"परंतु जानबूझकर हारना तो भ्रष्टाचार है. एक तो ऐसे ही कछुए से हारने के बाद मेरी आँखे नीचीं होगी और फिर भ्रष्टाचार में लिप्त होने से तो मैं किसी को मुँह भी नही दिखा सकूँगा." खरगोश के मन में धन लोभ जागृत हो चुका था.

"ये तो सारा संसार जानता है की तुम कभी भी कछुए को हरा सकते हो. वो अगर अपनी रफ़्तार को ड्रग्स की मदद से दस गुना बढ़ा ले तो भी तुम्हे हरा नही सकता. तुम्हे अपनी बिरादरी के कलंक को ढोने के मौके आगे भी मिल जाएँगे पर करोड़पति बनने का यह सुनहार अवसर फिर नही मिलेगा. और फिर तुम रेस हार कर अपनी हानि करोगे तो यह भ्रष्टाचार कैसे होगा? यहाँ तो लोग दूसरों के हिस्से के धन का घपला करने के बाद भी सर उठा के घूमते हैं. कभी सपने में भी नही सोचते की वो भ्रष्टाचार मे लिप्त हैं. जिन्हे जनता अपने हितों की रक्षा के लिए चुन कर भेजती है और जिन पर जनता के धन की रखवाली की ज़िम्मेदारी होती है वो भी तमाम तरह के व्यभिचार कर के बस अपना घर भरने में लगे रहते हैं. तुम अगर अपना नुकसान करके धन अर्जित करोगे तो यह भ्रष्टाचार कैसे हो सकता है." सत्ता मालिक ने अपना आखरी दाँव खेला.

परंतु खरगोश निर्णय नही कर पा रहा था. उसने पिछले एक महीने से सपने मे अपनी विजयी तस्वीर देखी थी. धन का लोभ किसे नही रहता पर कछुए से हार जाना यह बात उसके गले इतनी जल्दी नही उतर पाएगी यह सट्टा मालिक भी जानता था.

रेस देखने के लिए भारी भीड़ इकट्ठा हुई थी. भीड़ को संभालने के लिए पुलिस प्रंबंध कम पड़ रहे थे. टीवी चॅनेल दौड़ का सीधा प्रसारण कर रहे थे. दौड़ जब शुरू हुई तो खरगोश एक पलक मे काफ़ी आगे निकल गया. कछुआ अपनी मंद गति से आगे बढ़ने लगा, इस उम्मीद में की शायद खरगोश रास्ते में उसे कहीं सोता हुआ मिल जाए. परंतु जब काफ़ी दूरी के बाद उसे खरगोश नज़र नही आया तो उसे अपनी हार की निश्चितता का आभास होने लगा. पर जब वो मंज़िल पर पहुँचा तो खरगोश वहाँ भी नही था. सभी कछुए के जीत के नारे लगाने लगे. कछुए को अपनी जीत पर यकीन नही आ रहा था. पर खरगोश कहाँ था? कछुए की नज़रें उसे ही खोज रही थी. वो उसका पराजित चेहरा देखने को बेचैन हो रहा था.

तभी उसे वा सट्टा मालिक की कार मे बैठा आता हुआ दिखाई दिया. दोनो की नज़रें मिली. कछुए की चहेरे पे विजयी मुस्कान थी पर वो यह नही समझ पा रहा था की खरगोश के चहेरे की मुस्कान का राज क्या है?

अब निर्णय आपको करना है की जीत किसकी हुई? कछुए की या खरगोश की? पर यह याद रखिएगा की आपका निर्णय आपके नैतिक मूल्यांकन का आधार होगा.

Saturday 28 August 2010

पंडितजी का स्वाइन फ्लू

पंडितजी सुबह से छींक छींक कर थे हैरान परेशान
होश उड़ गए थे, कुछ भी नहीं था उन्हें भान,
बदन दुःख रहा था पूरा, आँखों से आ रहा था पानी
कब का भूल चुके थे जिसे, याद आ गयी उनको वो नानी.

क्या हुआ कैसे हुआ, इस सोच में उलझे थे बेचारे
लग गया डॉक्टर का चक्कर, दिख गया दिन में ही तारे,
नब्ज टटोला डॉक्टर ने और आँख मुंह का जाँच किया
और फिर जो बोला तो उनके ऊपर वज्रपात किया.

"पंडितजी ये आपको कैसे इस बीमारी ने जकड़ा
लगता है आपको तो स्वाइन फ्लू ने है पकड़ा,
पर चिंता मत करो अभी तो रोग की शुरुआत है
आप पूरी तरह ठीक हो जायेंगे बस दो दिन की बात है.
बस मैं जो दवाएं दे रहा हूँ आप उसे खाइए
पर ये रोग हुआ आपको, कैसे ये हमें बताइए,
ख़बरें देखते नहीं क्या आप, सावधानियों का रखना है ख्याल
भीड़ भाड़ वाले इलाकों में बंधना है मुंह नाक पर रुमाल.
हरेक शक सुबहा वाले व्यक्ति से छह फीट की दूरी रखना जरुरी है
और ऐसे में छुआ-छूत का पालन करना हमारी मज़बूरी है"

पंडितजी बोले- "मैंने तो सावधानियां बरती सारी हैं
वो सभी उपाय करता हूँ जिसकी मुझे जानकारी है,
और फिर छुआ-छूत का ध्यान रखना तो मज़बूरी नहीं मेरा धर्म है
डॉक्टर साहब, इसका पालन करना तो हमारा नित्य कर्म है.
पूजा पाठ भक्ति भाव मेरा धर्म मेरा ज्ञान है
अपना धर्म कैसे पवित्र रखना है इसका मुझे भान है"

डॉक्टर ने बीच में ही टोका- "खोखला है आपका ज्ञान सारा
विकास की दौड़ में आप जैसों के कारण ही पीछे है भारत हमारा,
अगर  छुआ-छूत भेद भाव को आप मानते अपना धर्म है
तो आप एक भारतीय हो इसपे भी मुझे शर्म है.

जाति धर्म और भाषा के आधार पर हम आपस में अंतर रखते हैं
और फिर भी विश्व महाशक्ति बनने का दिवास्वप्न देखते हैं,
मेरे इक्कीसवीं सदी के भारत की हालत आज पस्त है
क्यूंकि शिक्षित वर्ग की आधी आबादी भी छुआ-छूत के रोग से ग्रस्त है.

आप स्वाइन फ्लू को भूल जाओ ये तो मामूली बीमारी है
पर मैं आपको ठीक नहीं कर सकता, आपको तो भयंकर महामारी है".

Tuesday 24 August 2010

शादी करा दो

मेरे मित्र मियां बनवारी लाल, 
हरदम रहते हैं बड़े बेहाल
चेहरे पे परेशानी हरपल हैरान,
बहुत कम दिखती उनके होठों पे मुस्कान
सारांश में आप समझ ही गए होंगे,
बनवारी हैं एक आम शादीशुदा इंसान

पर बनवारी शादी से पहले ऐसे न थे,
चूसे हुए आम के जैसे न थे
उनके  चहरे पे भी रहती थी बहार,
हरदम खिलती थी हंसी की बयार
पर उनके पाणिग्रहण ने जुल्म ढाया,
चमकते चंद्रमुख पर ग्रहण छाया.
शाहरुख़ के समान उनकी थी खूबसूरत काया 
इस सांस्कृतिक कार्यक्रम ने ए के हंगल बनाया.

फिर भी जब कभी वो मुझे मिल जाते हैं
शादी कर लो की रट लगते हैं.
कहते हैं अपना बैंड बाजा जल्दी बजबाओ,
पछताना ही है तो लड्डू खा के पछताओ
बोलते हैं पत्नी होती है लक्ष्मी का रूप,
खिला देगी जीवन में सुनहरी धुप
कदम पड़ते ही दुनिया संवर जाएगी,
अरे जिंदगी खुशियों से भर जाएगी


मैं बोला बनवारीजी आँखें खोलो अपनी,
और छोडो बेगम का पल्लू
ये लक्ष्मियाँ हैं माना, पर आपको समझती हैं
ये अपना वाहन उल्लू

बनवारी बोले शादी तो पवित्र बंधन है,
सेवा करने साथ निभाने का वचन है
मैं बोला आज खून के रिश्ते खेलते खून की होली,
भाई भाई के सीने में दागता है गोली
फिर कौन भला जिंदगी भर साथ निभाता है,
आधुनिक राम वनवास को अकेले ही जाता है
भई हम कुंवारों की चिंता में ऊर्जा मत गवाओं,
करानी है तो कुछ अहम् शादियाँ कराओ


मिलन कराओ पहले भूखे का रोटी के साथ,
अधनंगो के फेरे कराओ साडी धोती के साथ
राजा का निकाह करा दो जिम्मेवारी से,
प्रजा का विवाह कराओ ईमानदारी से
दुखी चेहरों का मिलन करा दो मुस्कान से,
पहले इंसानियत की शादी कराओ इंसान से

आज इनका एक दूसरे से हो गया है तलाक,
और इसी कारण हमारा देश हो रहा है खाक
पहले इनका मिलन कराओ ये शादियाँ जरुरी हैं,
हमारी तुम्हारी शादी तो समझौता है मज़बूरी है.

Friday 20 August 2010

तुम ही कहो

Independence या  In Dependence...?? क्या कहूँ तुम ही कहो....??

आज आमजन के लिए हर मुकाम पे गुलामी है
कब तक ये सब अत्याचार  सहूँ  तुम ही कहो?

सब को यहाँ बस अपनी ही फ़िक्र है आजकल
देश अपना चला है किस चहूँ  तुम ही कहो?

आमजन के करूण क्रंदन, नेताओं का फिर भी वंदन,
स्वतंत्र  हूँ या हूँ अब भी बंदित, क्या कहूँ तुम ही कहो...

क्रांति के स्वर विकल हैं स्वार्थ के बियाबान में
धारा के विपरीत एक दुर्बल कैसे बहूँ  तुम ही कहो?

वैचारिक मुफ़लिसी में है आज मंदिर भी मस्जिद भी
गदर के लिए किस धर्म की शरण गहूँ तुम ही कहो?

मन में उथल पुथल मचती हो जब नग्न व्यभिचार पर
व्यक्त करूँ दिल की व्यथा  या चुपचाप रहूँ तुम ही कहो?

Thursday 19 August 2010

Independence Day: Just a Holiday or what????

‎"This year's independence day celebration is sponsored by BIG BAZAAR - Is se sasta aur Achcha kahee nahin milenga"......the lines made me to think about meaning of Independence for modern and new India.

For most of the current generation (myself included) 15th August primarily means a Holiday and some rituals like singing National Anthem while hoisting the tricolour at your workplace. No one today bother to think about the importance of Aazadi and the great battle many Deshbhakts fought to achieve it.

But the question is what should we do or rather what can we contribute towards Nation by remembering value of Independence of our country. Also I am not saying that we should celebrate the Independence Day like Windows XP- "Do more with less".

Today we all are thinking about ourselves only and always point fingers on others. Leave aside the country no one is bothered to think about the society also. But if the discussion point comes starts criticizing all- from the politicians to the traffic havaldar at the nearby chauk, though himself never hesitates in breaking the rules for the self-benefit.

So my point of view here is that either one should stop criticizing others or first correct oneself. This will be a good step in contributing towards development of our beloved country.