Friday, 20 August, 2010

तुम ही कहो

Independence या  In Dependence...?? क्या कहूँ तुम ही कहो....??

आज आमजन के लिए हर मुकाम पे गुलामी है
कब तक ये सब अत्याचार  सहूँ  तुम ही कहो?

सब को यहाँ बस अपनी ही फ़िक्र है आजकल
देश अपना चला है किस चहूँ  तुम ही कहो?

आमजन के करूण क्रंदन, नेताओं का फिर भी वंदन,
स्वतंत्र  हूँ या हूँ अब भी बंदित, क्या कहूँ तुम ही कहो...

क्रांति के स्वर विकल हैं स्वार्थ के बियाबान में
धारा के विपरीत एक दुर्बल कैसे बहूँ  तुम ही कहो?

वैचारिक मुफ़लिसी में है आज मंदिर भी मस्जिद भी
गदर के लिए किस धर्म की शरण गहूँ तुम ही कहो?

मन में उथल पुथल मचती हो जब नग्न व्यभिचार पर
व्यक्त करूँ दिल की व्यथा  या चुपचाप रहूँ तुम ही कहो?

3 comments:

  1. Thanks a lot to Rajiv Ranjan Mishra for vital inputs (first line is his contribution)

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  2. आपकी सहृदयता के लिए धन्यवाद. प्रारब्ध मेरा था किन्तु उसे आगे लाने और एक कविता की शकल देने का काम तो आपने ही किया और वो भी इतना रसमय और भावोत्पादक... आशा है आगे और भी उत्पाद सुरक्षित होंगे...

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  3. धन्यवाद राजीव भाई, आपका मार्गदर्शन और प्रोत्साहन बरकरार रहा तो लेखनी ज़रूर जारी रहेगी.

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