Tuesday 16 April 2013

कुछ मुक्तक



"उल्फत मेरे दिल की, तेरे सामने होठों से खुला ही नहीं,
तेरी आँखों को चाहत थी मेरी, तूने कभी कबूला ही नहीं,
हमारी और तुम्हारी खामोश मुहब्बत में फरक इतना है,
तुम्हे हम याद ही नहीं और तुझे मैं कभी भूला ही नहीं !"



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"ईमारत बुलंद थी प्रेम की कभी, खुला आज भी दिल का दरवाजा है,
रंग गहरा था इश्क का कभी, अहसास आज भी प्यार का ताजा है,
ख्वाबों और यादों में भी अब तो मुलाकात अपनी होती नहीं 'दीपक',
भूल गए तुम मुझको सनम या फिर मेरी उम्र का तकाजा है !"


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ना जाने क्यों

दिल उदास है ना जाने क्यों,
एक प्यास है ना जाने क्यों,
तू न आया, न आएगा कभी
तेरी आस है ना जाने क्यों !

रहता तू दिल में, पता है मुझे
तेरी तलाश है ना जाने क्यों !

आम बातें ही हैं जिंदगी में मेरी
बस तू खास है ना जाने क्यों !

समझदार था, पर आज न होश है
न मुझे हवास है ना जाने क्यों !

मर्ज़ी का मालिक था दिल तब
अब देवदास है ना जाने क्यों !

दुख तो सांझ है, आनी जानी है ये
बरसों से मेरे पास है ना जाने क्यों !

मौत तो है निश्चित, आएगी एक दिन
फिर भी कयास है ना जाने क्यों !