Saturday 18 December 2010

कब तक

कब तक बस यूँ ही
चलते जाना है?
  
अमूल्य मानव जीवन
के बेशक़ीमती पल
बीत रहे बेमकसद,
क्या हमारा लक्ष्य
सब कुछ खो कर बस
'हाथ का मैल' पाना है?
  
कब तक बस यूँ ही
चलते जाना है?
  
कौन मित्र कौन शत्रु
सबके इतने सारे चेहरे
असलियत जान पाना मुश्किल,
आस्तीन के साँप कई यहाँ
कब तक इंसानियत के नाम पर
सबको गले से लगाना है?
  
कब तक बस यूँ ही
चलते जाना है?
  
आधुनिकता के दौर में
ग्लोबल नेटवर्क से तो
संपर्क अटूट है,
बहुत से मसले खुद से हैं
थोड़ा समय मिले तो
अपने आप से बतियाना है.
  
कब तक बस यूँ ही
चलते जाना है?

हौसले गर हो बुलंद
और इरादे हो जब मजबूत
समय लेता इम्तिहान बड़े,
ईश्वर का खेल तो देखो
आग वहीं लगती है
जहाँ 'दीपक' का आशियाना है.
  
कब तक बस यूँ ही
चलते जाना है?

5 comments:

  1. बहुत सुन्दर !!!
    क्या हमारा लक्ष्य

    सब कुछ खो कर बस

    ...'हाथ का मैल' पाना है?

    इन पंक्तियों की सार्थकता प्रभावित करती है...
    मूल्यों को ताक पर रख हम किस दिशा में बढ़ रहे हैं.... सोचनीय है!

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  2. धन्यवाद अनुपमा जी. आप जैसे सुधी कवियों की सराहना मुझ जैसे बाल कवियों को प्रोत्साहित करती है.

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  3. दीपक! बहुत अच्छे विषय को आपने बहुत सहजता से अभिव्यक्त किया है. आपकी यह रचना मुझे बहुत अच्छी लगी.

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  4. DEEPAK ji aap ke vichar achar hamesha hi prerit karte rahe hai

    Kun ki aah vahi lagati jaha DEEPAK ka ashiyana hai
    abhay

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  5. Thanks Abhay bhai,

    aap logon ka protsahan hi ti meri urja hai.

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