Wednesday 3 November 2010

कोलाहल

जिंदगी की दौड़ यूँ ही रोजमर्रे की,
मन में मची घमासान हलचल.
बाहर 'सब चलता है' की नीरव शांति,
अंदर 'आख़िर क्यूँ' का कोलाहल.

भौतिकता की इस लंगड़ी दौड़ में,
कैसे हो समाज की मुश्किलें हल.
हर कोई आज बस यही सोच में,
वो खुद नहीं, कोई और करे पहल.

जब तक खुद पे ना बन पड़े,
विरोध का सुर कहाँ निकलता है.
वरना सब के दिल में बस यही स्वर,
कि भई आजकल सब चलता है.

चिंतन यही मन में, कैसे बनेगी,
बिगडती हुई ये बात ये हालात.
आखिर कौन उठाएगा अपना हाथ,
कहाँ से होगी बदलाव की शुरुआत.

6 comments:

  1. हर कोई आज बस यही सोच में,
    वो खुद नहीं, कोई और करे पहल.
    vigul baje badlao ho...
    rachnatmak dundubhi prakaash failaye!
    sundar rachna!
    ...shubhkamnayen!

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  2. kal 17 -12 -2010 ko aapki yah post charchamanch par hogi.. http://charchamanch.blogspot.com..aap vaha aa kar apne vichar likhein...

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  3. बहुत ही खुब लिखा है आपने......आभार....मेरा ब्लाग"काव्य कल्पना" at http://satyamshivam95.blogspot.com/ जिस पर हर गुरुवार को रचना प्रकाशित नई रचना है "प्रभु तुमको तो आकर" साथ ही मेरी कविता हर सोमवार और शुक्रवार "हिन्दी साहित्य मंच" at www.hindisahityamanch.com पर प्रकाशित..........आप आये और मेरा मार्गदर्शन करे..धन्यवाद

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  4. thanks Satyam ji.

    dhanyavaad sangeeta ji.

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