Friday, 4 February, 2011

आईना

आज हम सब दोष देते हैं बस ज़माने को,
क्यूँ नहीं कोई तैयार खुद को समझाने को.

हम स्वयं अपना कर्त्तव्य नहीं निभा सकते,
फिर भला दूसरों पर उंगली कैसे उठा सकते.

हम किसी पर भी एक उंगली उठाते हैं जब,
तीन उंगलियाँ खुद की तरफ ही उठती हैं तब.

कोई नहीं राजी स्वयं को आईना दिखाने को,
क्यूँ नहीं कोई तैयार खुद को समझाने को.

मानव जन्म मिला है मुश्किल से हर इंसान को,
पर लगे हैं सब बदलने में ईश्वर के विधान को.

ईश्वर ने तो बनाया हम सबको एक समान,
पर दीवारें खड़ा करने में लगा है हर इंसान.

सब फ़िराक में हैं दूसरों की बस्तियां जलाने को,
क्यूँ नहीं कोई तैयार खुद को समझाने को.

जन हित की बातें लगती आज सबको ढकोसला,
दुनिया हो गयी है सबका सिर्फ अपना ही घोसला.

समाज हितैषी  फिट नहीं आधुनिक ज़माने को,
क्यूँ नहीं कोई तैयार खुद को समझाने को.

1 comment:

  1. अच्छी रचना के लिए आभार. हिंदी लेखन के क्षेत्र में आप द्वारा किये जा रहे प्रयास स्वागत योग्य हैं.
    आपको बताते हुए हमें हर्ष का अनुभव हो रहा है की भारतीय ब्लॉग लेखक मंच की स्थापना ११ फरवरी २०११ को हुयी, हमारा मकसद था की हर भारतीय लेखक चाहे वह विश्व के किसी कोने में रहता हो, वह इस सामुदायिक ब्लॉग से जुड़कर हिंदी लेखन को बढ़ावा दे. साथ ही ब्लोगर भाइयों में प्रेम और सद्भावना की बात भी पैदा करे. आप सभी लोंगो के प्रेम व विश्वाश के बदौलत इस मंच ने अल्प समय में ही अभूतपूर्व सफलता अर्जित की है. आपसे अनुरोध है की समय निकलकर एक बार अवश्य इस मंच पर आये, यदि आपको मेरा प्रयास सार्थक लगे तो समर्थक बनकर अवश्य हौसला बुलंद करे. हम आपकी प्रतीक्षा करेंगे. आप हमारे लेखक भी बन सकते है. पर नियमो का अनुसरण करना होगा.
    भारतीय ब्लॉग लेखक मंच

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