Wednesday, November 3, 2010

कोलाहल

जिंदगी की दौड़ यूँ ही रोजमर्रे की,
मन में मची घमासान हलचल.
बाहर 'सब चलता है' की नीरव शांति,
अंदर 'आख़िर क्यूँ' का कोलाहल.

भौतिकता की इस लंगड़ी दौड़ में,
कैसे हो समाज की मुश्किलें हल.
हर कोई आज बस यही सोच में,
वो खुद नहीं, कोई और करे पहल.

जब तक खुद पे ना बन पड़े,
विरोध का सुर कहाँ निकलता है.
वरना सब के दिल में बस यही स्वर,
कि भई आजकल सब चलता है.

चिंतन यही मन में, कैसे बनेगी,
बिगडती हुई ये बात ये हालात.
आखिर कौन उठाएगा अपना हाथ,
कहाँ से होगी बदलाव की शुरुआत.

कुछ नहीं

बे-तलब तुम कहते कुछ नही बा-अदब हम कहते 'कुछ नहीं'!  आंखों में किताब है पूरी लब क्यूं कहते कुछ नहीं? बातों का मौसम भी हो तब क्यूं कहत...