Sunday 24 July 2011

उम्मीद


इतनी चोट खाके भी मोहब्बत से अभी डरा नहीं है,
टूटा तो है कई बार, पर दिल अभी बिखरा नहीं है.


ओ रात थोड़ा रुक जा ऐ चाँद ज़रा ठहर जा,
प्यास अभी बुझी नहीं, दिल अभी भरा नहीं है.


सुलह करते है तुझसे यही सोच के हर बार,
कि तेरे अंदर का इंसान अभी मरा नहीं है.


तेरे दीदार के बिना हम तो कब के मर गये होते
शुक्र है ख्वाबों की मुलाकात पे अभी पहरा नहीं है.


घर की रोशनी ही चली गयी है तेरे जाने से,
रात ढल गयी है, पर चाँद अभी उतरा नहीं है.


बिना जात-धर्म जाने अपना बना लेता है,
दिल ये पगला है बड़ा, अभी सुधरा नहीं है.


तुझसे बिछुड़के हर नशा छोड़ दिया मैनें,
दर्द-ए-ग़म के नशे सा अभी दूसरा नहीं है.

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