मेरे मौला सुन ले तू ताकीद मेरी एक और,
आस ही रह गयी खुशियों की दीद मेरी एक और,
मेरे ग़म आये गले मिलने को तन्हाई में मुझसे
कुछ इस तरह गुजर गयी ईद मेरी एक और !!
मन के अन्दर जब कुछ ऐसे विचार भाव आते हैं जो कि कलम को उद्वेलित करते हैं कि उनको कविता, छंद, मुक्तक या यूँ ही एक माला में पिरो दूँ !! कुछ ऐसे ही विचारों का संग्रह किया है यहाँ पर !
बे-तलब तुम कहते कुछ नही बा-अदब हम कहते 'कुछ नहीं'! आंखों में किताब है पूरी लब क्यूं कहते कुछ नहीं? बातों का मौसम भी हो तब क्यूं कहत...