हर कदम चोट लगी यूं कि चलना भूल गए
अजनबी लगा जो ज़माना, मिलना भूल गए
अपनी उम्मीदों पर खरे उतरना मुश्किल है
इतनी बार बुझे हैं कि अब जलना भूल गए
मन के अन्दर जब कुछ ऐसे विचार भाव आते हैं जो कि कलम को उद्वेलित करते हैं कि उनको कविता, छंद, मुक्तक या यूँ ही एक माला में पिरो दूँ !! कुछ ऐसे ही विचारों का संग्रह किया है यहाँ पर !
चाय अब भी शायद आग पर वैसे ही उबलती होगी और यादें पके आते थे, वो मेज़ अब भी वहीं होगी, जहाँ चाय के साथ कुछ ख़्वाब रखे जाते थे। कभी कॉफ़ी के...
बहोत खूब सर
ReplyDeleteबहुत बहुत धन्यवाद🙏💕
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