Sunday, July 16, 2023

सावन

सावन की रिमझिम में दिल को डुबो कर देखता हूं

पुरानी यादें सूखी पड़ी हैं ज़रा भींगो कर देखता हूं.


खुशी से ताल्लुक अपना कुछ ऐसा रहा है मेरे यार

कभी मिलती है तो खुद को सूई चुभो कर देखता हूं.


मुलाकात भी बंद है और ख्वाब में भी आते नहीं

सोच रहा हूं आज खुली आंख सो कर देखता हूं.


थक गया हूं मैं नाकाम हसरतों के दर्द झेल कर

तो अच्छा है अब सारी चाहतें खो कर देखता हूं.


ता-उम्र नेक काम किये पर नाम कुछ हुआ नहीं

फैसला अब कर लिया बदनाम हो कर देखता हूं.


ज़िंदगी जब भी मुसलसल बोर करने लगती है

जो पहले कभी ना किया तब वो कर देखता हूं.


दवा, बातें, वक्त, दुआएं जब कुछ काम आते नहीं

तब अपने जख्मों को आंसू से धो कर देखता हूं.


ज़िंदगी की सूखी फसल शायद हरी हो जाये कल

रोज़ सुबह उम्मीद का एक बीज बो कर देखता हूं.

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इल्तिजा

मैं तारों से बातें करता था, 

यूं तमाम हर रातें करता था.

दिल में मेरे बस ग़म ही थे, 

खुशी के कारण कम ही थे.

सब की नज़रों में सिकंदर था, 

पर मन भय का एक समंदर था.

दिन रात यूं सबकी फिक्र में था, 

स्वंय खुद से कभी जिक्र न था.

दी सबको तो खुशहाली थी, 

पर खुद तो बदली काली थी.

सपने सब कब से रूखे थे, 

इक आस के जैसे भूखे थे.

ख्वाहिश तो दिल में चंद ही थे, 

पर उम्मीद उनकी भी बंद ही थे.


सुख के पल अपनों को लाई थी, 

पर फिर बाद वही तन्हाई थी.

और वो पल भी अक्सर आता था, 

जब मन का दर्द बहुत गहराता था.

जाल भंवर का यूं छा जाता था

कि बस अंधकार ही भाता था.

सुनता कौन? तो कह ही नहीं पाते थे, 

मर्द था न, आंसू बह भी नहीं पाते थे.


आंखों में सागर की सूखी लहरें छाईं थी, 

और तब नज़रों से तेरी सूरत टकराई थी.

जाने क्या था क्यूं था कि 

तेरी सूरत इतनी भायी थी, 

अनजाने ही दिल तक मेरे

वो निश्छल हंसी समायी थी.

फिर मन में तरंगें अथाह उठी थी, 

तुमसे मिलने की चाह उठी थी.


जिस ईश्वर ने ये रोग लगाया था

उसने ही सुखद संयोग बनाया था.

ये दुनिया इतनी प्यारी होने वाली थी, 

कब सोचा था यूं यारी होने वाली थी.

अवसर आया कुछ मुलाकातों का

कुछ पल चुप और कुछ बातों का, 

मिल कर जुड़ते उन ज़ज्बातों का

सिलसिला फिर जागती रातों का.

तेरे मन में भी कुछ जरुर हुआ था, 

दिल के कोने को शायद मैंने छुआ था.


हां दिल के तार जुड़ चले थे, 

मन आसमान में उड़ चले थे.

बरसों से जो पल चाहे थे, 

तुम संग ही मैंने पाये थे.

वो पल भी फिर अनेक हुये, 

दो थे, जाने कब एक हुये.

कैसे तुम ये जतन कर लेते हो, 

आंखों में ही सब पढ़ लेते हो.

चाहे घिरे ग़म के बादल हों, 

या खुशी का कोई इक पल हो.

तुम्हें ही बताने की चाहत रहती है, 

बता दूं, फिर बड़ी राहत रहती है.


तुम साथ हो तो एक सुकून होता है

ज़िंदगी जीने का एक जूनून होता है

यूं तो बस पानी जैसा ही लगता है

तुम साथ हो तो रगों में खून होता है.

मुझे तुम दिल से कभी दूर ना करना, 

भंवरों में लौटने को मजबूर ना करना.

अब इल्तिजा बस इतनी सी है कि

इक दूजे का केयर करना बंद ना हो, 

कभी दूर भले कितने भी रहें हम

सुख दुख का शेयर करना बंद ना हो.

Monday, July 3, 2023

अश्रु



इंसान रोता कब है....?


जब पीड़ा से मन फटता हो

और बुनने वाला कोई ना हो,

जब दिल के टुकड़े बिखरें हों

और चुनने वाला कोई ना हो,

जब दर्द शब्द में ढ़ल कर भी

यूं कंठ के अंदर सिमटा हो

जब लब कहने को आतुर हों

और सुनने वाला कोई ना हो !

तब दिल के अंदर की पीड़ा

आंखों से बाहर बहती है

मन हल्का होते रहता है

और दुनिया कायर कहती है!


उपरोक्त पंक्तियों में जो भाव है उसके एक विपरीत पहलू पर मैंने कुछ लिखने की कोशिश की है. पढ़िये और अपनी प्रतिक्रिया कमेंट्स में अवश्य बताईये................ 


इंसान कब नहीं रोता है? 


दुख दिल का साझा करने को

जो अपना सा कोई पास हो,

या बंध कुछ ऐसा गहरा हो

कि दूरी का ना अहसास हो


जब दर्द की सर्द सी आहों से

मुख से कोई बोल नहीं फूटे

पर वो बूझ जायेगा नज़रों से

इसका दिल को विश्वास हो !


गर कोई हाथ पकड़ने वाला हो

या कोई मन को पढ़ने वाला हो.

आंखों सासों के रिश्ते से

यूं पीर सभी कम रहता है, 

जब यार कोई संग ऐसा हो

फिर कहां कोई ग़म रहता है !!



Sunday, May 14, 2023

मुस्कान

ज़िंदगी है तो दर्द भी है

चैन-ओ-आराम नहीं है, 

पर प्यारी सुबहा भी है

सिर्फ ग़म की शाम नहीं है, 


इसलिये मुस्कुराओ और

मुस्कानें बिखेरते रहो

क्यूंकि होठों से दूसरा

बेहतरीन काम यही है!

Wednesday, May 10, 2023

इतना तो पता है !


हाँ, हम फिर मिलेंगे !

किस्मत की धूप में कुम्हलाए कुसुम

पुन: अवश्य खिलेंगे

हाँ, हम फिर मिलेंगे !


कब? ये तो ज़हन में अभी लापता है

पर कहाँ, कैसे, किस तरह, इतना तो पता है !

 

जब उतरेगी सूरज की पहली किरण

तो हम ठंडी ठंडी हवा के झोंकें बन

जैसे पवन आती शीतल नदी के अर्श पर

वैसे ही कोमलता से तन मन को स्पर्श कर


दिवस के उस मधुर पहर में

सुकून भरे सुहाने से सहर में

थाम कर एक दूजे का हाथ

और बस धड़कनें करेंगी बात

कब? ये तो ज़हन में अभी लापता है

पर कहाँ, कैसे, किस तरह, इतना तो पता है !

 

जैसे पत्तियाँ चाय में  घुल कर मिल जाते हैं

और दोनों एक ही स्याह रंग में  खिल जाते हैं

इतना कि कह ही नही सकते कि कौन बड़ा है

और किसके रंग का असर किस पर चढ़ा है

कुछ वैसे ही सुबह की पहली चाय की प्याली संग

और एक दूसरे में घुले हमारे खुश्बू-ख़याली रंग


अमृत रस भरेंगे आँखों और ज़ुबान में

यूँ महकेंगे इश्क़ में डूबे मीठी मुस्कान में

कब? ये तो ज़हन में अभी लापता है

पर कहाँ, कैसे, किस तरह, इतना तो पता है !

 

मिट्टी पर पड़ी पहली बारिश की बूँदों के बाद

ज्यों हवा में घुलता सौंधी सी खुश्बू का स्वाद

उन बूँदों जैसे ही उतर जाएँगे प्यासे अधरों पर

और फिर खुश्बू बिखरेगी उमंगों की लहरों पर


सांसों के संवादों की लेकर थाह

संग सुकून की एक गहरी आह

अम्न चैन से सीने से लग जायेंगें

और ग़म के बादल यूं भग जायेंगें

कब? ये तो ज़हन में अभी लापता है

पर कहाँ, कैसे, किस तरह, इतना तो पता है !

 

दिन के अंत में खामोशी से ना यूँ कल्पनाओं में रहेंगे

ये ख़याल ख्वाब ना शब्द बन बस भावनाओं में बहेंगें

कलम की स्याही बन कोरे पन्नों को भरेंगें

और यूं इस अधूरी कहानी को पूरा करेंगें

हाँ मालूम है भाग्य हौसलों को साध सकती है

हाथों की लकीरें दिल की उम्मीदें बांध सकती है


पर नसीब के महासागर को भी पाट कर

किस्मत की उन तमाम रेखाओं को काट कर

हकीकत में ये सब रंग अपने दामन के हासिल आयेंगीं

और हमारी जीवन रेखाएं यूं आपस में मिल जायेंगीं

अभी हम तुम में हैं और कभी तुम होते हो हम में

यकीन है कि हम बस हम हो रहेंगें अगले जनम में

कब? ये तो ज़हन में अभी लापता है

पर कहाँ, कैसे, किस तरह, इतना तो पता है !

हाँ इतना तो पता है !

Wednesday, April 5, 2023

सिफारिश

उसने कोई न चाहत रखी ना कोई ख़्वाहिश करता है

 ना कभी हसरत ही की ना कोई गुज़ारिश करता है,

यार, मेरे अंदर उस के जैसा जाने कौन ये रहता है

मेरे दिल में रह कर भी उसकी सिफारिश करता है.


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दोस्तों के दरम्यां कभी कोई बौन न रहे

बात हो खुल के हर पल कि मौन न रहे, 

आज मिल लो कि कल का भरोसा नहीं

क्या पता कल यहां हम में से कौन न रहे.

Saturday, April 1, 2023

पहेली

कभी मीठी तो कभी कसैली सी है

ये बंद मुट्ठी भी खाली हथेली ही है

प्रश्न इसके तू कितने भी हल कर ले

ज़िन्दगी थी पहेली, पहेली ही है.


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अंधेरी रातों में भी बस उजाले लिखेंगे

चाहे सुबहा तक जलके हम काले दिखेंगे

जगमगाता दीपक तो है ज़माने के लिये

झांक अंदर तो फिर दिल के छाले दिखेंगे.


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अक्ल ने कहा मत देख, फिर भी हमने देख लिया

दिल ने चाहा देख तो दिल का सुनके, देख लिया

इश्क मोहब्बत पागलपन है ऐसा दुनिया कहती थी

समझदारी से ऊब गया तो पागल बनके देख लिया.

कुछ नहीं

बे-तलब तुम कहते कुछ नही बा-अदब हम कहते 'कुछ नहीं'!  आंखों में किताब है पूरी लब क्यूं कहते कुछ नहीं? बातों का मौसम भी हो तब क्यूं कहत...