Saturday, December 7, 2024

दर्द

रेत में जल कर भी दरिया की ख्वाहिश न थी

दो बूंद की थी चाह सैलाब की फरमाइश न थी

ऊपर वाले कभी अपने फैसले को भी तो देख

तेरे अथाह सागर में कतरे की भी गुंजाइश न थी? 

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