हर कदम चोट लगी यूं कि चलना भूल गए
अजनबी लगा जो ज़माना, मिलना भूल गए
अपनी उम्मीदों पर खरे उतरना मुश्किल है
इतनी बार बुझे हैं कि अब जलना भूल गए
मन के अन्दर जब कुछ ऐसे विचार भाव आते हैं जो कि कलम को उद्वेलित करते हैं कि उनको कविता, छंद, मुक्तक या यूँ ही एक माला में पिरो दूँ !! कुछ ऐसे ही विचारों का संग्रह किया है यहाँ पर !
बे-तलब तुम कहते कुछ नही बा-अदब हम कहते 'कुछ नहीं'! आंखों में किताब है पूरी लब क्यूं कहते कुछ नहीं? बातों का मौसम भी हो तब क्यूं कहत...
बहोत खूब सर
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